नैनीताल , सितंबर 07 -- उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने शिक्षकों के तबादलों से जुड़े मामले में राज्य सरकार से तबादलों के आधार और प्रक्रिया से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी तलब की है।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी एवं न्यायमूर्ति सिद्धार्थ साह की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता जीवन सिंह की ओर से दायर जनहित याचिका पर सोमवार को सुनवाई करते हुए शिक्षा विभाग के महानिदेशक तथा कुमाऊं और गढ़वाल मंडल के अपर निदेशकों को उन शिक्षकों द्वारा प्रस्तुत दिव्यांगता प्रमाणपत्र अदालत में पेश करने के निर्देश दिए हैं, जिनके आधार पर उनके तबादले के अनुरोध स्वीकार किए गए।
मामले में राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि पर्वतीय क्षेत्रों में कार्यरत शिक्षकों का तबादला पर्वतीय क्षेत्रों में तथा मैदानी क्षेत्रों में तैनात शिक्षकों का तबादला मैदानी क्षेत्रों में किया गया और पूरी प्रक्रिया निर्धारित नीति के अनुसार हुई।
हालांकि, याचिकाकर्ता की ओर से इस पर सवाल उठाते हुए कहा गया कि यह स्पष्ट नहीं है कि किस स्थान को पर्वतीय और किसे मैदानी क्षेत्र माना गया है। इस पर न्यायालय ने राज्य सरकार से पहाड़ और मैदान के वर्गीकरण के लिए अपनाए गए मानदंड स्पष्ट करने को कहा है।
सुनवाई के दौरान राज्य के अधिवक्ता ने 12 सितंबर 2025 को उच्च न्यायालय के आदेश का भी हवाला दिया। बताया गया कि शिक्षा मंत्री की अध्यक्षता वाली समिति के निर्णय को कार्मिक एवं सतर्कता विभाग को भेजा गया था। हालांकि इस मामले में कार्मिक एवं सतर्कता विभाग ने क्या निर्णय लिया, इसकी जानकारी अदालत के समक्ष स्पष्ट नहीं हो सकी।
उच्च न्यायालय ने राज्य के अधिवक्ता को इस संबंध में भी निर्देश प्राप्त कर, यदि कोई निर्णय लिया गया है तो उसकी प्रति अगली सुनवाई में पेश करने को कहा है।
मामले की अगली सुनवाई 15 सितंबर 2026 को होगी।
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