नैनीताल , अप्रैल 22 -- उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने काशीपुर स्थित पुरातात्विक महत्व के द्रोण सागर लेक (झील) के आसपास कथित अतिक्रमण मामले में बुधवार को सुनवाई करते हुए राज्य सरकार से अतिक्रमणकारियों के खिलाफ कार्रवाई के मामले में रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं।
मुख्य न्यायाधीश जी0 नरेंदर और न्यायमूर्ति आलोक महरा की खंडपीठ में आज काशीपुर निवासी चक्रेश कुमार जैन की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई हुई। काशीपुर के उप जिलाधिकारी की ओर अदालत में रिपोर्ट पेश करते हुए कहा गया अतिक्रमण मामले की जांच जारी है। द्रोण सागर की भूमि पर अतिक्रमण नहीं हुआ है। कुछ अतिक्रमणकारियों को नोटिस जारी किया गया है।
दूसरी ओर इसी मामले में हस्तक्षेपकर्ता अजय कुमार चौहान और अन्य की ओर से कहा गया कि द्रोण सागर की भूमि पर भारी मात्रा में अतिक्रमण किया गया है। यहां पौरातात्विक स्वरूप को बदल दिया गया है। ट्रस्ट के अधिवक्ता डीएस मेहता की ओर से अदालत को अतिक्रमण से संबंधित फोटोग्राफ भी सौंपे गए। हस्तक्षेपकर्ता की ओर से रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए कहा गया कि उप जिलाधिकारी की ओर से जो रिपोर्ट पेश की गई है वह वर्ष 2020 की है। यह जनहित याचिका 2025 में दायर की गई है।
अदालत ने फोटोग्राफ और दस्तावेजों का गहराई से परीक्षण करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिए कि उपरोक्त दो अतिक्रमणकारियों को नोटिस दिए गए हैं उनके संबंध में क्या कार्रवाई की गयी है। इस संबंध में रिपोर्ट पेश करें।
गौरतलब है कि याचिकाकर्ता की ओर से वर्ष 2025 में दायर याचिका में कहा गया कि काशीपुर स्थित ऐतिहासिक द्रोण सागर लेक में अतिक्रमण के साथ अनैतिक गतिविधियां बढ़ रही हैं। इस स्थान का महाभारत काल से जुड़ाव माना जाता है और माना जाता है कि पांडवों ने अपने गुरू द्रोणाचार्य के लिये इस लेक का निर्माण किया था। याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि इस लेक के चारों ओर 30 ऐतिहासिक मंदिर मौजूद हैं।
वर्ष 2018 में एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने इस क्षेत्र के पुरातात्विक महत्व को देखते हुए इसे एएसआई के अधीन करने पर सहमति दी थी। वर्ष 2020 में ऊधम सिंह नगर के जिलाधिकारी की ओर से लेक के संरक्षण के लिये उप जिलाधिकारी की अध्यक्षता में एक तीन सदस्यीय कमेटी गठित की गयी लेकिन कोई रिपोर्ट नहीं दी गयी है।
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