जयपुर , अक्टूबर 03 -- राजस्थान उच्च न्यायालय ने भरतपुर जिले की पंचायत समिति उचैन की ग्राम पंचायत बरीघा में सरपंच पद के लिए 24 सितंबर को निकाली गयी आरक्षण लॉटरी को अवैध मानते हुए निरस्त कर दिया है।
अदालत ने पंचायती राज विभाग को नियमानुसार नये सिरे से आरक्षण प्रक्रिया पूरी करके सात दिन के भीतर नयी लॉटरी निकालने के निर्देश दिये हैं।
न्यायमूर्ति आनंद शर्मा की एकलपीठ ने एक अक्टूबर को रविंद्र सिंह बनाम राजस्थान सरकार एवं अन्य मामले में यह फैसला सुनाया। इसी तरह के तथ्यों वाली करौली जिले की दो अन्य याचिकाओं पर भी अदालत ने साथ में सुनवाई करके साझा निर्णय दिया।
याचिकाकर्ता बरीघा निवासी रविंद्र सिंह की ओर से अधिवक्ता तनवीर अहमद ने अदालत को बताया कि संविधान के अनुच्छेद 243D, राजस्थान पंचायती राज अधिनियम, 1994 की धारा 15 और पंचायती राज निर्वाचन नियम, 1994 के नियम सात के तहत आरक्षित सीटों का चक्रानुक्रम से आवंटन अनिवार्य है। इसके बावजूद बरीघा में सरपंच पद को दोबारा अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित कर दिया गया।
राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता कपिल प्रकाश माथुर ने दलील दी कि पंचायत समिति उचैन नवसृजित है, इसलिए आरक्षण का चक्र नये सिरे से शुरू होना चाहिए।
अदालत ने नियम 7(12) और राज्य सरकार के विभिन्न परिपत्रों का उल्लेख करते हुए कहा कि पंचायत समिति के पुनर्गठन या नवसृजन के आधार पर आरक्षण का नया चक्र लागू नहीं किया जा सकता, जब तक निर्धारित आरक्षण चक्र पूरा नहीं हो जाता। अदालत ने स्पष्ट किया कि आरक्षण प्रक्रिया में संवैधानिक और वैधानिक प्रावधानों का पालन जरूरी है और एक ही वर्ग को बार-बार आरक्षण देने से आरक्षण व्यवस्था का उद्देश्य प्रभावित हो सकता है।
उच्च न्यायालय ने बरीघा की आरक्षण लॉटरी निरस्त करते हुए संबंधित अधिकारियों को निर्णय की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने की तारीख से सात दिन के भीतर नियमों और लागू परिपत्रों के अनुसार नयी प्रक्रिया पूरी करने के निर्देश दिये।
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