बिलासपुर , मई 07 -- छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने वर्ष 2010 के चर्चित ताड़मेटला नक्सली हमले मामले में आज एक बड़ा फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार की अपील को खारिज कर दिया है।

उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि इतने गंभीर मामले में भी अभियोजन पक्ष अदालत के सामने कानूनी रूप से मान्य और भरोसेमंद साक्ष्य पेश नहीं कर पाया। इसी वजह से ट्रायल कोर्ट को आरोपियों को बरी करना पड़ा।

न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि यह बेहद दुखद है कि ऐसा मामला, जिसमें बड़ी संख्या में जवान शहीद हुए और राष्ट्रीय सुरक्षा पर गंभीर असर पड़ा, उसका अंत इस तरह हुआ। अदालत ने माना कि मामले में प्रत्यक्ष साक्ष्यों की कमी रही, परिस्थितिजन्य साक्ष्य भी अधूरे थे और जांच प्रक्रिया में कई खामियां सामने आईं। इन कारणों से अभियोजन पक्ष आरोपियों का अपराध ''उचित संदेह से परे'' साबित नहीं कर सका।

दरअसल, राज्य सरकार ने दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 378(1) के तहत अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, दक्षिण बस्तर द्वारा सात जनवरी 2013 को सुनाए गए फैसले को चुनौती दी थी। ट्रायल कोर्ट ने सभी आरोपियों को आईपीसी की धारा 148, 120बी, 396 (76 गिनती), शस्त्र अधिनियम की धारा 25 और 27 तथा विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 3 और 5 के तहत लगाए गए आरोपों से बरी कर दिया था।

मामला 06 अप्रैल 2010 को दंतेवाड़ा जिले के ताड़मेटला गांव के जंगल में हुए बड़े नक्सली हमले से जुड़ा है। जानकारी के अनुसार, सीआरपीएफ की 62वीं बटालियन के उप कमांडर सत्यवान सिंह अपनी कंपनी और पुलिस बल के साथ चार अप्रैल से सात अप्रैल 2010 तक एरिया डोमिनेशन पेट्रोलिंग पर थे। इसी दौरान छह अप्रैल की सुबह जंगल में नक्सलियों ने सुरक्षा बलों पर अचानक भारी गोलीबारी शुरू कर दी। जवाब में जवानों ने भी आत्मरक्षा में फायरिंग की, लेकिन इस हमले में 76 जवान शहीद हो गए थे।

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