जयपुर , अक्टूबर 10 -- राजस्थान उच्च न्यायालय ने राजस्थान प्रशासनिक सेवा (आरएएस) संयुक्त प्रतियोगी परीक्षा-2013 की मुख्य परीक्षा में उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन में संभावित तकनीकी त्रुटि को गंभीरता से लेते हुए राजस्थान लोक सेवा आयोग (आरपीएससी) को कुछ प्रश्नों के उत्तरों की दोबारा जांच कराने के निर्देश दिये हैं।

अदालत ने कहा कि लगातार कई सवालों में शून्य अंक दिए जाने और उत्तरों को गलत दर्शाने के लिए गलत का निशान नहीं होने से तकनीकी गड़बड़ी की आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

न्यायमूर्ति गणेश राम मीणा की एकलपीठ ने अभ्यर्थी महिपाल सिंह चारण की याचिका स्वीकार करते हुए यह आदेश दिया। अदालत ने आरपीएससी को सामान्य हिंदी एवं सामान्य अंग्रेजी से संबंधित पेपर- चौथा में प्रश्न संख्या छह से आठ तक के उत्तरों की किसी स्वतंत्र परीक्षक से दोबारा जांच कराने के निर्देश दिये हैं।

याचिकाकर्ता महिपाल सिंह चारण आरएएस मुख्य परीक्षा-2013 में शामिल हुए थे। उन्हें कुल 449 अंक मिले थे। मेरिट के आधार पर 14 सितंबर 2017 को उन्हें कर निर्धारण विभाग में सेवा आवंटित की गयी थी। बाद में सूचना का अधिकार कानून के तहत उत्तर पुस्तिका की प्रति प्राप्त करने पर उन्हें कुछ सवालों में लगातार शून्य अंक दिये जाने का पता चला।

याचिकाकर्ता के अनुसार, संबंधित सवालों के जवाब उत्तर पुस्तिका में लिखे हुए थे, लेकिन उन्हें गलत दर्शाने के लिए 'गलत' का निशान नहीं लगाया गया था। उन्होंने कंप्यूटर के माध्यम से उत्तर पुस्तिकाओं की जांच में तकनीकी त्रुटि की आशंका जताते हुए आरपीएससी के समक्ष शिकायत भी की, लेकिन आयोग ने पुनर्मूल्यांकन की मांग स्वीकार नहीं की।

आयोग की ओर से अदालत में दलील दी गयी कि उत्तर पुस्तिका का मूल्यांकन विषय विशेषज्ञ ने किया था और इसमें कोई तकनीकी गड़बड़ी नहीं हुई। नियमों में अंकों की दोबारा गणना का प्रावधान है, लेकिन उत्तरों के पुनर्मूल्यांकन की अनुमति नहीं है। आयोग ने यह भी कहा कि किसी उत्तर पर 'गलत' का निशान नहीं होने मात्र से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उसकी जांच नहीं हुई।

दूसरी ओर, याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता संदीप सिंह शेखावत और अधिवक्ता प्रियांशी जायसवाल ने पैरवी करते हुए कहा कि पूरी उत्तर पुस्तिका का पुनर्मूल्यांकन नहीं, बल्कि केवल संदिग्ध प्रश्नों की दोबारा जांच की मांग की गयी है। आरपीएससी की ओर से अधिवक्ता एम.एफ. बेग ने पक्ष रखा।

अदालत ने उत्तर पुस्तिका का अवलोकन करने के बाद कहा कि जिन उत्तरों के लिए अंक दिये गये थे, उनके सामने सही का निशान था, जबकि संबंधित प्रश्नों में लगातार शून्य अंक दिये गये और गलत होने का संकेत भी नहीं था। ऐसे में मूल्यांकन के दौरान अनजाने में हुई गलती की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता।

उच्च न्यायालय ने निर्देश दिया कि संबंधित उत्तरों की जांच ऐसे स्वतंत्र परीक्षक से करायी जाये, जिसे मामले की विस्तृत जानकारी न दी जाये। दोबारा जांच के आधार पर याचिकाकर्ता की मेरिट संशोधित की जायेगी और मेरिट और सेवा प्राथमिकता के अनुसार सेवा आवंटन पर निर्णय लिया जायेगा।

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