नयी दिल्ली , जून 19 -- उच्चतम न्यायालन ने शुक्रवार को उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें 13 मई, 2026 को तमिलनाडु विधानसभा में मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली 'तमिलगा वेट्री कझगम' (टीवीके) सरकार द्वारा प्राप्त किए गए विश्वास मत के दौरान कथित भ्रष्टाचार एवं विधायकों की खरीद-फरोख्त की सीबीआई जांच की मांग की गई थी।
मदुरै के रहने वाले के.के. रमेश की याचिका को खारिज करते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने कहा कि आरोपों के समर्थन में कोई विश्वसनीय सबूत नहीं पेश किया गया इसलिए इसमें दखल देने की आवश्यकता नहीं है।
बेंच ने याचिका खारिज करते हुए अपने आदेश में कहा, "याचिका खारिज की जाती है। यह याचिका अस्पष्ट, बेबुनियाद एवं हल्के-फुल्के आरोपों पर आधारित है जिनके समर्थन में रिकॉर्ड पर कोई विश्वसनीय सामग्री नहीं है। हमें इसमें दखल देने का कोई आधार नहीं दिखता।"याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि टीवीके विधानसभा चुनावों में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी लेकिन उसके पास शुरू में स्थिर सरकार बनाने के लिए आवश्यक संख्या नहीं थी। याचिका के अनुसार, टीवीके, जिसके पास 234 सदस्यीय विधानसभा में 108 विधायक थे, बाद में कांग्रेस, सीपीआई, सीपीएम वीसीके, आईयूएमएल, बगावती अन्नाद्रमुक विधायकों के एक गुट और एकमात्र एएमएमके विधायक का समर्थन प्राप्त किया, जिससे सरकार को 144 विधायकों के समर्थन के साथ विश्वास मत जीतने में मदद मिली।
याचिका में आरोप लगाया गया कि अन्य पार्टियों से आने वाले विधायकों का समर्थन लुभावने वादों से सुनिश्चित किया गया और बड़ी रकम का लेन-देन हुआ।
याचिकाकर्ता की तरफ से पेश हुए वकील सी.आर. जय सुकीन ने तर्क दिया कि देश में राजनीतिक वफादारी में बदलाव और पार्टी छोड़ने की प्रवृति तेजी से बढ़ रही है या तो पैसे के कारण या दबाव के कारण।
वकील ने कहा, "इस देश में पार्टी नेता या तो रिश्वत देकर भ्रष्टाचार कर रहे हैं या फिर धमकी दे रहे हैं कि अगर पार्टी में शामिल नहीं हुए तो परिवार के सदस्यों को नुकसान पहुंचाया जाएगा।"आरोपों के आधार पर सवाल उठाते हुए, मुख्य न्यायाधीश ने वकील से उस राज्य और राजनीतिक पार्टी का नाम बताने को कहा जिसका वह उल्लेख कर रहे थे। मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी किया कि "कौन सी सत्ताधारी पार्टी? आपके राज्य में तो पार्टियां बदलती रहती हैं।"श्री सुकिन ने जवाब दिया कि यह घटनाक्रम किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है और उन्होंने देश के अलग-अलग हिस्सों के ऐसे मामलों का उल्लेख किया जहां विधायकों ने कथित रूप से अपनी राजनीतिक निष्ठा बदली है, एक ऐसा चलन जो लोकतांत्रिक मूल्यों को कमज़ोर कर रहा था।
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