नयी दिल्ली , जनवरी 29 -- उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को उन याचिकाओं के समूह पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया, जिनमें चुनाव आयोग (ईसीआई) के कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की वैधता को चुनौती दी गई थी।

न्यायालय इस बात की जांच कर रहा है कि क्या चुनाव आयोग के पास संविधान के अनुच्छेद 326, लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत यह अधिकार है कि वह एसआईआर को वर्तमान स्वरूप में संचालित कर सके।

मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने नवंबर 2025 से चल रही व्यापक सुनवाई के बाद मामले पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।

अधिकांश याचिकायें पिछले वर्ष जून में तब दायर की गयी थीं, जब चुनाव आयोग ने बिहार में एसआईआर की प्रक्रिया आरंभ करने का निर्णय किया। गैर-सरकारी संगठनों, राजनीतिक नेताओं और व्यक्तिगत कार्यकर्ताओं सहित 13 से अधिक याचिकाकर्ताओं ने न्यायालय का रुख किया है।

इनमें मुख्य याचिकाकर्ता के रूप में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर), पीयूसीएल, योगेंद्र यादव, महुआ मोइत्रा ( तृणमूल कांग्रेस सांसद), मनोज झा (आरजेडी सांसद), के.सी. वेणुगोपाल (कांग्रेस सांसद) और सुप्रिया सुले (एनसीपी-एसपी) आदि शामिल हैं। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि एसआईआर एक अप्रत्यक्ष "एनआरसी जैसी प्रक्रिया" है, जो प्रभावी रूप से चुनाव आयोग को नागरिकता सत्यापन के लिए एक वास्तविक प्राधिकरण में बदल देती है। उन्होंने तर्क दिया कि मतदाता पात्रता संबंधी शंकाओं का समाधान लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 16 के अनुसार ही किया जाना चाहिए, जिसमें मतदाता सूची से अयोग्य घोषित किए जाने के विशिष्ट आधार बताए गये हैं।

याचिका में कहा गया है कि नागरिकता संबंधी मुद्दे नागरिकता अधिनियम की धारा 8 और 9 के अंतर्गत केंद्र सरकार और विदेशी न्यायाधिकरणों के अनन्य अधिकार क्षेत्र में आते हैं। याचिका में अस्थायी मतदाता सूची बनाकर और व्यक्तियों पर निर्दिष्ट दस्तावेजों के माध्यम से नागरिकता साबित करने का बोझ डालकर, एसआईआर पर वैधानिक व्यवस्था को उलटने का आरोप लगाया गया था।

याचिकाकर्ताओं ने आगे तर्क दिया कि एसआईआर के तहत नामों को हटाने से "निलंबित नागरिकता" की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। उन्होंने यह भी दावा किया कि एसआईआर में उपयोग किए गए जनगणना प्रपत्रों को आरपी अधिनियम या नियमों के तहत वैधानिक मान्यता प्राप्त नहीं है। आरपी अधिनियम की धारा 21(3) की व्याख्या को लेकर एक और चुनौती खड़ी की गई, जिसमें याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि यह कई राज्यों में एक समान एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण) की अनुमति नहीं देता है।याचिका में चुनाव आयोग को किसी निर्वाचन क्षेत्र या निर्वाचन क्षेत्र के किसी भाग के लिए विशेष पुनरीक्षण का निर्देश देने का अधिकार देने वाले वाक्यांश को केवल असाधारण परिस्थितियों में लागू होने वाला बताया गया, न कि राज्यों में सामूहिक पुनरीक्षण पर। याचिकाकर्ताओं ने एसआईआर प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी का भी आरोप लगाया, जिसमें उन्होंने ऐसे उदाहरणों का हवाला दिया जहां मतदाताओं को नाम हटाने का कारण नहीं बताया गया और नाम हटाने के बाद मतदाता संख्या में अस्पष्ट उतार-चढ़ाव देखे गये।

वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिबल, डॉ. ए.एम. सिंघवी, गोपाल शंकरनारायणन, शादान फरासत, पी.सी. सेन और राजू रामचंद्रन, साथ ही अधिवक्ता प्रशांत भूषण, वृंदा ग्रोवर, निज़ाम पाशा और शाहरुख आलम विभिन्न याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुये।

याचिकाओं का विरोध करते हुये, चुनाव आयोग ने कहा कि सत्यापन प्रक्रिया को केवल चुनावी उद्देश्यों के लिए ही देखा जाना चाहिये, न कि निर्वासन या अन्य परिणामों के लिए नागरिकता निर्धारित करने की प्रक्रिया के रूप में। आयोग ने एसआईआर को एक "उदार, सौम्य" प्रक्रिया बताया, जिसमें किसी भी प्रकार की कठोर या दबावपूर्ण जांच शामिल नहीं है।

चुनाव आयोग ने याचिकाकर्ताओं के लाल बाबू हुसैन मामले में 1995 के फैसले पर आधारित तर्क को भी स्पष्ट किया, जिसमें कहा गया था कि मतदाता सूची में नाम होने से भारतीय नागरिकता की धारणा उत्पन्न होती है, और आपत्ति करने वाले पर इसे गलत साबित करने का भार होता है। चुनाव आयोग के अनुसार, उस मामले का तथ्यात्मक संदर्भ काफी भिन्न था। यह तर्क दिया गया कि लाल बाबू हुसैन के मामले में कार्यवाही एसआईआर के अनुसार हुई थी, जिसमें पुलिस सत्यापन शामिल था और पुलिस रिपोर्ट का अभाव था, जबकि वर्तमान प्रक्रिया का संचालन पूरी तरह से चुनाव आयोग कर रहा है और इसमें पुलिस की कोई भागीदारी नहीं है।

आयोग ने आगे कहा कि एसआईआर अधिसूचना के तहत पूर्व मतदाता सूचियों में नाम शामिल होने को ही पर्याप्त प्रमाणिक महत्व दिया गया है। आयोग ने जोर दिया कि संविधान "नागरिक-केंद्रित" है और यह सुनिश्चित करना उसका संवैधानिक दायित्व है कि मतदाता सूचियों में गैर-नागरिकों के नाम शामिल न हों। आयोग ने यह भी कहा कि वह इस मुद्दे से जुड़ी राजनीतिक बयानबाजी से चिंतित नहीं है।

वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी, मनिंदर सिंह और दामा शेषाद्री नायडू, अधिवक्ता एकलव्य द्विवेदी के साथ आयोग की ओर से पेश हुये।

हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित