नयी दिल्ली , नवंबर 20 -- उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को संपूर्ण अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं के लिए सतत खनन प्रबंधन योजना (एमपीएसएम) तैयार करने का निर्देश दिया। न्यायालय ने पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील इस क्षेत्र की रक्षा के लिए वैज्ञानिक रूप से निर्देशित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया।
अरावली पर्वतमाला दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में फैली हुयी है।
यह निर्देश अवैध खनन से संबंधित एक मामले में दिया गया है जहाँ न्यायालय ने पहले कहा था कि विभिन्न राज्य "अरावली पहाड़ियों/रेंज " की असंगत परिभाषाओं का पालन करते हैं। मई 2024 में न्यायालय ने इस मुद्दे की जाँच के लिए एक समिति का गठन किया। समिति ने अक्टूबर 2025 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमें अरावली परिदृश्य के संरक्षण के लिए एक समान परिभाषाओं और कई उपायों की सिफारिश की गई।
समिति के अनुसार, अरावली जिलों में स्थानीय सतह से 100 मीटर या उससे अधिक ऊँचाई वाली कोई भी भू-आकृति अरावली पहाड़ी मानी जानी चाहिए। इसने अरावली पर्वतमाला को दो या दो से अधिक अरावली पहाड़ियों के रूप में परिभाषित किया जो एक-दूसरे से 500 मीटर के भीतर स्थित हैं और जिन्हें निम्नतम समोच्च रेखा के सबसे बाहरी बिंदु से मापा जाता है।
मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई, न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने इन परिभाषाओं को स्वीकार किया और समिति की उस सिफारिश को भी मंजूरी दे दी जिसमें मुख्य या अछूते क्षेत्रों में खनन पर प्रतिबंध लगाने की बात कही गई थी। न्यायालय ने हालांकि खनन पर पूर्ण यह कहते हुए प्रतिबंध लगाने से इनकार कर दिया कि इस तरह के प्रतिबंध अवैध खनन, माफिया और अपराध को बढ़ावा दे सकते हैं।
पीठ ने कहा "हम अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं में सतत खनन की सिफारिशों और अवैध खनन को रोकने के लिए उठाए जाने वाले कदमों को भी स्वीकार करते हैं।" न्यायालय ने कहा कि यद्यपि समिति ने महत्वपूर्ण रणनीतिक और परमाणु खनिजों को छोड़कर मुख्य क्षेत्रों को खनन से बाहर रखने का ध्यान रखा है, फिर भी झारखंड में सारंडा और चाईबासा वनों के लिए भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (आईसीएफआरई) द्वारा किए गए अध्ययन के समान एक विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन करना उचित होगा।
न्यायालय ने केंद्र सरकार को आईसीएफआरई के माध्यम से संपूर्ण अरावली क्षेत्र को शामिल करते हुए एक एमपीएसएम तैयार करने का निर्देश दिया। एमपीएसएम का उद्देश्य अनुमत खनन क्षेत्रों, संरक्षण-महत्वपूर्ण क्षेत्रों,पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील क्षेत्रों और पुनर्स्थापन-प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की पहचान करना है जहाँ खनन प्रतिबंधित होना चाहिए या केवल असाधारण वैज्ञानिक रूप से उचित परिस्थितियों में ही अनुमति दी जानी चाहिए। इसमें समग्र पर्यावरणीय प्रभाव आकलन भी शामिल होगा और क्षेत्र की पारिस्थितिक वहन क्षमता का विश्लेषण किया जाएगा। न्यायालय ने खनन के बाद की पुनर्स्थापन और पुनर्वास योजनाओं का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।
न्यायालय ने आदेश दिया कि जब तक एमपीएसएम को अंतिम रूप नहीं दिया जाता, कोई भी नया खनन लाइसेंस जारी न किया जाए। इसकी स्वीकृति के बाद खनन की अनुमति केवल उन्हीं क्षेत्रों में दी जाएगी जिन्हें एमपीएसएम के तहत सतत खनन के लिए उपयुक्त घोषित किया गया है।लेकिन इस बीच समिति की सिफारिशों के अनुसार पहले से चल रहा कानूनी खनन जारी रह सकता है।
न्यायालय ने अरावली श्रृंखला के पारिस्थितिक महत्व का उल्लेख करते हुए कहा कि सतत खनन तभी आगे बढ़ना चाहिए जब एक व्यापक एमपीएसएम तैयार हो। इसमें कहा गया है कि पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, अरावली श्रृंखला की निरंतरता और अखंडता सुनिश्चित करते हुए जिला-स्तरीय एमपीएसएम तैयार करने पर भी विचार कर सकता है।
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