नयी दिल्ली , सितंबर 21 -- उच्चतम न्यायालय भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) की उस याचिका पर सुनवाई करेगा जिसमें राष्ट्रीय राजमार्गो पर आवारा जानवरों से जुड़े निर्देशों पर स्पष्टीकरण देने का आग्रह किया गया है।
एनएचएआई ने सोमवार को इस संबंध में उच्चतम न्यायालय में एक याचिका दायर की। याचिका में तर्कदिया गया है कि पूरे राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क पर आश्रय स्थल, खास परिवहन सुविधाएँ और संबंधित बुनियादी ढांचे बनाना और चलाना उसके कानूनी दायरे से बाहर है। इसके लिए मौजूदा अधिकार क्षेत्र और बजट के दायरे से हटकर बहुत ज़्यादा मानव बल और पैसे की ज़रूरत होगी।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के समक्ष इस आवेदन का ज़िक्र किया और इसे जल्द सुनवाई के लिए सूचीबद्व करने का आग्रह किया।
सीजेआई ने मामले को उस पीठ के सामने रखने पर सहमति जतायी जिसने पहले निर्देश जारी किये थे।
एनएचएआई ने अपनी याचिका में स्पष्टीकरण मांगा है कि आवारा मवेशियों और अन्य जानवरों को हटाने, ज़ब्त करने और उन्हें आश्रय देने की मुख्य ज़िम्मेदारी राज्य के अधिकारियों, स्थानीय निकायों और अधिसूचित राजमार्ग प्रशासन की है, न कि उसकी।
याचिका में 19 मई के फैसले के उस निर्देश की ओर ध्यान दिलाया गया है जिसमें एनएचएआई से राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ तालमेल बिठाने और खास गाड़ियाँ, होल्डिंग सुविधाएँ, शेल्टर और पशु कल्याण संगठनों व गौशालाओं के साथ मिलकर व्यवस्था करने को कहा गया था।
एनएचएआई ने कहा है कि भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण अधिनियम, 1988 और राष्ट्रीय राजमार्ग (भूमि एवं यातायात) नियंत्रण अधिनियम, 2002 के तहत उसके काम मुख्य रूप से राष्ट्रीय राजमार्ग के विकास, रखरखाव और प्रबंधन से जुड़े हैं। उसने 2002 के अधिनियम की धारा 37 का भी ज़िक्र किया है, जो राजमार्ग में रुकावट डालने वाले जानवरों को हटाने और उन्हें हिरासत में लेने से संबंधित है।
प्राधिकरण के अनुसार अक्टूबर 2025 में संबंधित हिस्सों के लिए जिला मजिस्ट्रेट को राजमार्ग प्रशासक के तौर पर अधिसूचित किया गया था और इसलिए वे कानूनी योजना के तहत मुख्य फील्ड-लेवल अधिकारी हैं।
हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित