हुगली , जुलाई 29 -- बंगाल के सबसे महान समाज सुधारकों और शिक्षाविदों में से एक ईश्वर चंद्र विद्यासागर की होम्योपैथी में भी गहरी एवं अटूट रुचि थी ओर उनके जीवन का यह पहलू बहुत कम लोगों को मालूम है, जो आज भी इतिहासकारों तथा शोधकर्ताओं को आकर्षित करता है।

बंगाल के इतिहासकार और शोधकर्ता पार्थ चटर्जी ने एक असाधारण रूप से सफल चिकित्सक के रूप में विद्यासागर की ओर ध्यान आकर्षित किया है, जिन्होंने विशेष रूप से उन लोगों की सेवा की जो चिकित्सीय इलाज का खर्च नहीं उठा सकते थे।

श्री चटर्जी ने विस्तार से बताया कि उन्नीसवीं सदी के भारत के महानतम समाज सुधारकों और शिक्षाविदों में से एक के रूप में सम्मानित विद्यासागर होम्योपैथी के भी एक समर्पित छात्र थे। ऐतिहासिक रिकॉर्ड और उनके बचे हुए मेडिकल नोटबुक से पता चलता है कि उन्होंने अनगिनत मरीजों का इलाज किया, उनके लक्षणों, दवाओं तथा परिणामों का बारीकी से दस्तावेज तैयार किया।

उनके पुराने दमा से जुड़ा एक प्रसिद्ध किस्सा है। विद्यासागर की जीवनी के अनुसार, उन्हें गर्म चाय पीने से अक्सर राहत मिलती थी। एक बार जब वह सांस लेने में बहुत तकलीफ के साथ घर लौटे और चाय पी, तो उन्हें सामान्य से कहीं अधिक जल्दी आराम मिल गया।

कारण जानने के लिए उत्सुक होकर उन्होंने अपने सेवक से पूछताछ की, जिसने स्वीकार किया कि जल्दबाजी में केतली साफ नहीं की गई थी। निरीक्षण करने पर केतली के अंदर दो उबले हुए कॉकरोच मिले। इस घटना को खारिज करने के बजाय, विद्यासागर ने वैज्ञानिक उत्सुकता के साथ इस पर विचार किया। इस अप्रत्याशित सुधार ने उन्हें उबले हुए कॉकरोच से तैयार अर्क के साथ प्रयोग करने के लिए प्रेरित किया, जिसे बाद में उन्होंने होम्योपैथिक सिद्धांतों के अनुसार पतला किया।

कुछ विवरणों में दावा किया गया है कि उन्होंने काली खांसी और सांस की बीमारियों से पीड़ित मरीजों को यह दवा दी, जिसके उत्साहजनक परिणाम दर्ज किये गये , हालांकि यह घटना एक किस्से के रूप में बनी हुई है और चिकित्सा इतिहासकारों द्वारा पूरी तरह से स्वीकार नहीं की गयी है, फिर भी यह विद्यासागर की चिकित्सा पद्धति से जुड़ी लोककथाओं में एक दिलचस्प स्थान रखती है।

शोधकर्ताओं के अनुसार, उनकी चिकित्सा डायरियां उनके अनुशासित इलाज के तरीके को दिखाती हैं। इंद्रा मित्रा की पुस्तक 'करुणासागर विद्यासागर' में प्रकाशित एक प्रविष्टि के अनुसार, उन्होंने सात अक्तूबर 1880 से हरिमोहन नाम के एक मरीज का इलाज शुरू किया था। उसी रिकॉर्ड में 16 अक्तूबर 1880 को मरीज के सामने 'ठीक हुआ' लिखा गया है।

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