लखनऊ , जून 11 -- उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने प्रदेश के मुख्यमंत्री से मांग की है कि जून माह में लगाए गए 10 प्रतिशत ईंधन एवं विद्युत क्रय समायोजन अधिभार (एफपीपीए) शुल्क की वसूली पर तत्काल रोक लगाई जाए तथा पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए।

परिषद के अध्यक्ष एवं देश की सर्वोच्च केंद्रीय सलाहकार समिति के सदस्य अवधेश कुमार वर्मा ने कहा कि विद्युत नियामक आयोग पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि जून माह में 10 प्रतिशत ईंधन अधिभार शुल्क लगाए जाने का आकलन निर्धारित नियमों के अनुरूप नहीं है और यह सीधे तौर पर कानून का उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि प्रदेश के ऊर्जा मंत्री ने भी यह सार्वजनिक रूप से कहा है कि उन्हें इस निर्णय की जानकारी सोशल मीडिया के माध्यम से प्राप्त हुई तथा इस विषय में उनसे कोई राय नहीं ली गई। ऐसे में यह मामला और अधिक गंभीर हो जाता है।

श्री वर्मा ने कहा कि यदि नियामक आयोग द्वारा एक जून को ही ईंधन अधिभार शुल्क की वसूली को कानून के विरुद्ध बताया जा चुका था और ऊर्जा मंत्री की जानकारी एवं सहमति के बिना यह निर्णय लिया गया, तो यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन को नियम-कानूनों की अनदेखी कर मनमाने ढंग से निर्णय लेने का अधिकार किसने दिया है। उन्होंने मुख्यमंत्री से तत्काल हस्तक्षेप कर उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करने की मांग की।

उपभोक्ता परिषद अध्यक्ष ने कहा कि परिषद ने गर्मी शुरू होने से पहले ही आगाह किया था कि प्रदेश में विद्युत क्षेत्र की वर्टिकल व्यवस्था विफल होती जा रही है तथा संविदा कार्मिकों की कमी के कारण बिजली आपूर्ति और अनुरक्षण व्यवस्था प्रभावित होगी। परिषद ने बर्खास्त किए गए सभी संविदा कर्मियों को पुनः सेवा में लिए जाने का प्रस्ताव भी विद्युत नियामक आयोग की सर्वोच्च संवैधानिक समिति राज्य सलाहकार समिति के समक्ष रखा था।

उन्होंने कहा कि अब स्वयं प्रदेश के ऊर्जा मंत्री भी यह स्वीकार कर रहे हैं कि संविदा कर्मियों को सेवा से नहीं हटाया जाना चाहिए। उनके अनुसार ऊर्जा मंत्री द्वारा इस संबंध में आधा दर्जन से अधिक निर्देश पावर कॉरपोरेशन को दिए गए, लेकिन उन निर्देशों का भी पालन नहीं किया गया। इससे यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि पावर कॉरपोरेशन आखिर किस व्यवस्था और अधिकार के तहत कार्य कर रहा है।

श्री वर्मा ने आरोप लगाया कि पावर कॉरपोरेशन में लगातार मनमाने तरीके से निर्णय लिए जाते रहे हैं। उन्होंने कहा कि चाहे बिजली चोरी के मामलों में संसद द्वारा बनाए गए कानून की भावना के विपरीत निदेशक मंडल द्वारा राजस्व निर्धारण में 65 प्रतिशत तक की छूट दिए जाने का मामला हो अथवा लगभग 18,885 करोड़ रुपये के स्मार्ट प्रीपेड मीटर टेंडर को बढ़ाकर 27,342 करोड़ रुपये में आवंटित किए जाने का मामला, उपभोक्ता परिषद लगातार इन मुद्दों को उठाती रही है।

उन्होंने कहा कि प्रदेश के लाखों बिजली उपभोक्ताओं के हितों को ध्यान में रखते हुए मुख्यमंत्री को पावर कॉरपोरेशन की कार्यप्रणाली की व्यापक समीक्षा करानी चाहिए। साथ ही जून माह में लगाए गए ईंधन एवं विद्युत क्रय समायोजन अधिभार शुल्क की वसूली पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाने के निर्देश जारी किए जाने चाहिए।

उपभोक्ता परिषद का कहना है कि ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े निर्णयों में पारदर्शिता, जवाबदेही और नियामकीय प्रक्रियाओं का पालन सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है, ताकि बिजली उपभोक्ताओं के आर्थिक हितों की रक्षा हो सके और विद्युत व्यवस्था के प्रति आमजन का विश्वास बना रहे।

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