(शीर्षेन्दु पंत से)कोलकाता , अप्रैल 12 -- पिछले सात सालों में लोकसभा या विधानसभा चुनावों में अपने पुराने गढ़ पश्चिम बंगाल में सत्ता जमाने की असफल कोशिश के बावजूद, वाम मोर्चे के प्रमुख घटक मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) को लगता है कि इस विधानसभा चुनाव में पार्टी फिर से अपना जनाधार जुटाने में सफल रहेगी।

माकपा के राज्य सचिव मोहम्मद सलीम ने 'यूनीवार्ता' को दिए एक साक्षात्कार में कहा, "फिर से खड़े हो रहे बंगाल के लिए, एक पुनर्जीवित वामपंथ आवश्यक है। हम अपनी रणनीति के अनुसार काम कर रहे हैं।"लगातार 34 वर्षों तक बंगाल की सत्ता पर काबिज रहने वाले वाम मोर्चे पर इस बार शायद ही किसी चुनावी पंडित ने दांव लगाया है। इस तथ्य को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता है कि 2011 में तृणमूल कांग्रेस के हाथों से सत्ता से बाहर किये जाने के बाद वाम मोर्चा विपक्ष का स्थान बनाए रख पाने में भी असफल रहा है। भारतीय जनता पार्टी ने उससे यह स्थान भी छिन लिया है।

पिछले कुछ चुनावों में उसके मत प्रतिशत बाकायदा इस बात की तस्दीक भी करते हैं। इसका मत प्रतिशत घटकर मात्र पांच से सात प्रतिशत के बीच रह गया है। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों में इसे केवल दो सीट मिला, जबकि 2019 और 2024 के आम चुनावों तथा 2021 के विधानसभा चुनावों में यह खाता भी नहीं खोल पायी।

इसने 2016 के विधानसभा चुनाव में तुलनात्मक रूप से बेहतर प्रदर्शन किया था, जब कांग्रेस (44) के साथ मिलकर इसने कुल 77 सीटें जीती थीं। उस समय यह गठबंधन मुख्य विपक्षी बन कर उभरा था, तब मोर्चे ने संयुक्त रूप से कुल 19.5 प्रतिशत मत हासिल किए थे।

इस महीने के अंत में दो चरणों में होने वाले चुनाव में कोई आंकड़ा दिये बिना मार्क्सवादी नेता ने वामपंथ की किस्मत बदलने का भरोसा जताया और कहा कि यह उम्मीद कई कारकों पर आधारित है।

श्री सलीम ने कहा कि सबसे पहली और महत्वपूर्ण बात यह है कि गठबंधन ने वाम मोर्चे के बीच व्यापक एकता हासिल की है। राज्य माकपा मुख्यालय मुजफ्फर अहमद भवन में अपने छोटे से कक्ष में उन्होंने कहा, "अब एक नयी उर्जा के साथ खड़ा हुआ वामपंथ है, जो अधिक एकजुट है। यहां तक कि वे वामपंथी दल और समूह भी साथ आए हैं, जो पारंपरिक रूप से वाम मोर्चे के घटक नहीं रहे हैं।"अपनी बात को पुष्ट करने के लिए, उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन का उल्लेख किया, जो 1960 के दशक में कम्युनिस्ट आंदोलन में विभाजन के बाद पहली बार वाम मोर्चे के सहयोगी के रूप में राज्य विधानसभा चुनाव में भाग ले रही है।

पार्टी की शीर्ष नीति निर्धारण संस्था पोलितब्यूरो के सदस्य श्री सलीम ने 2024 में आरजी कर अस्पताल में एक युवा पोस्ट-ग्रेजुएट प्रशिक्षु डॉक्टर के साथ हुए जघन्य बलात्कार-हत्याकांड के खिलाफ व्यापक विरोध प्रदर्शनों में वामपंथ की 'सफलता' और महत्वपूर्ण भूमिका पर भी प्रकाश डाला। इसके अलावा आम लोगों की रोजी रोटी और बुनियादी मुद्दों को उठाने में वाम मोर्चे की सक्रियता का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि मोर्चा कामकाजी वर्गों और बेरोजगार युवाओं को भी संगठित करने में सफल रहा है।

श्री सलीम ने कहा कि 2023 के पिछले पंचायत चुनाव के बाद से बंगाल ने अभूतपूर्व हिंसा और लूट देखी गई है। इस अवधि में वामपंथी आंदोलन ने गति पकड़ी है। उन्होंने कहा, "भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) बंगाल के लोगों से संबंधित किसी भी मुद्दे को उठाते हुए कहीं नहीं दिखी।"यह पूछे जाने पर राज्य में तृणमूल कांग्रेस और भाजपा की द्विध्रुवीय राजनीतिक स्थिति को देखते हुए कि क्या उनका मूल्यांकन यथार्थवादी है तो श्री सलीम कहा,"1990 के दशक में इस देश में भी एक द्वि-दलीय प्रणाली स्थापित करने की कोशिश की गई थी। लेकिन अब वह धराशायी हो गई है। बंगाल में यह और अधिक समय तक कैसे जारी रह सकता है!"राज्य में कथित धार्मिक ध्रुवीकरण पर एक सवाल का जवाब देते हुए श्री सलीम ने कहा, "जबकि भाजपा और तृणमूल दिखावटी एवं नफरत भरे अभियान, विभाजनकारी राजनीति और मंदिर-मस्जिद जैसी राजनीति से लोगों को मूर्ख बनाने पर भरोसा कर रही हैं, हम लोगों को उन चालों के बारे में जागरूक कर रहे हैं।"माकपा नेता ने शिकायत की कि धार्मिक त्योहारों का उपयोग सांप्रदायिक हिंसा को और अधिक बढ़ाने या विभाजनकारी राजनीति को मजबूत करने के लिए भी किया जा रहा है। उन्होंने कहा, "लेकिन बंगाल के लोग इसे दोबारा नहीं स्वीकार करेंगे। उन्होंने विरोध करना शुरू कर दिया है।"साक्षात्कार के दौरान श्री सलीम ने भाजपा और तृणमूल के बीच सांठगांठ पर बार-बार जोर दिया। उन्होंने अतीत में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ द्वारा ममता बनर्जी को 'मां दुर्गा' बताए जाने और भाजपा तथा तृणमूल के बीच नेताओं के बार-बार 'प्रवास और पुन: प्रवास' का उल्लेख किया।

माकपा नेता ने कहा, "हमने आरजी कर विरोध प्रदर्शनों के दौरान भी देखा, जैसा कि अन्य सभी घटनाओं में हुआ है, जब लाखों लोगों ने न्याय के लिए गुहार लगाई, लेकिन तृणमूल और भाजपा के बीच मिलीभगत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार द्वारा संचालित एजेंसियों द्वारा निभाई गई भूमिका के कारण न्याय नहीं मिला। अब लोग देख सकते हैं कि ये दोनों तंत्र नागपुर के इशारे पर कैसे काम करते हैं।"भाकपा (एमएल) लिबरेशन को साथ लेने के अलावा, वाम मोर्चे ने इंडियन सेकुलर फ्रंट (आईएसएफ) के साथ भी सीटों का तालमेल किया है, लेकिन कांग्रेस के साथ गठबंधन करने की कोशिशें विफल रहीं। इसे 'दुर्भाग्यपूर्ण' बताते हुए श्री सलीम ने अखिल भारतीय कांग्रेस समिति (एआईसीसी) और इसके राज्य नेतृत्व को जिम्मेदार ठहराया।

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