चेन्नई , अक्टूबर 24 -- भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) भू-राजनीतिक परिस्थितियों में तेजी से हो रहे बदलावों के बीच अपनी नैविक उपग्रह श्रृंखला को मजबूत करने की तत्काल जरूरत के मद्देनजर 30 अक्टूबर को श्रीहरिकोटा स्थित अंतरिक्ष केंद्र से जीएसएलवी-एमके-II के जरिए नौवहन उपग्रह एनवीएस-03 का प्रक्षेपण करने की तैयारी कर रहा है।
पीएसएलवी के दो मिशनों को मिले झटकों के बाद होने जा रहे इस प्रक्षेपण का विशेष महत्व है। पिछले महीने जीएसएलवी-एफ17/ईओएस-05 पृथ्वी अवलोकन उपग्रह (जीआईएसएटी-1ए) मिशन की सफलता के साथ इसरो ने फिर कामयाबी हासिल की थी। इस सफलता से उत्साहित होकर इसरो अब भारत की स्वदेशी उपग्रह नौवहन प्रणाली नैविक को पूरी तरह से चालू करने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम उठाने जा रहा है।
एनवीएस-03 उपग्रह का वजन 2,250 किलोग्राम है। यह नैविक की दूसरी पीढ़ी की श्रृंखला का तीसरा उपग्रह है। इससे पहले भारतीय क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह प्रणाली (आईआरएनएसएस) पहली पीढ़ी की उपग्रह श्रृंखला थी। इसरो के सूत्रों ने शनिवार को यूनीवार्ता को बताया कि एनवीएस-03 को लेकर जीएसएलवी रॉकेट 30 अक्टूबर को सुबह 11 बजकर 51 मिनट पर दूसरे प्रक्षेपण मंच से उड़ान भरेगा।
कुछ समय की देरी के बाद हो रहा यह प्रक्षेपण पिछले वर्ष जनवरी में जीएसएलवी-एफ15 के जरिए भेजे गए एनवीएस-02 उपग्रह की विफलता की पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण है। हालांकि, उपग्रह को भू-तुल्यकालिक स्थानांतरण कक्षा (जीटीओ) में स्थापित कर दिया गया था, लेकिन एक खराबी के कारण इसे निर्धारित भूस्थिर कक्षा में नहीं पहुंचाया जा सका। यह खराबी पाइरो वाल्व में आई थी, जिसके चलते अंतरिक्ष यान के लिक्विड एपोजी मोटर (एलएएम) तक आवश्यक ऑक्सीडाइजर का प्रवाह नहीं हो पाया।
इस विफलता की जांच के लिए गठित एक शीर्ष समिति ने निष्कर्ष निकाला कि इसकी सबसे संभावित वजह कनेक्टर के एक संपर्क का अलग हो जाना था। समिति की सिफारिशों के आधार पर सुधार के सभी उपाय किए गए। इन उपायों को दो नवंबर, 2025 को एलवीएम-3 एम3 के जरिए प्रक्षेपित सीएमएस-03 उपग्रह में सफलतापूर्वक लागू किया गया और उसकी पाइरो प्रणालियों ने संतोषजनक ढंग से काम किया। इसरो ने यह भी कहा कि भविष्य के सभी मिशनों में इन सिफारिशों का पालन किया जाएगा।
शुरुआत में भारतीय क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह प्रणाली (आईआरएनएसएस) के नाम से जानी जाने वाली इस प्रणाली का नाम बाद में बदलकर नैविक (नेविगेशन विद इंडियन कॉन्स्टेलेशन) कर दिया गया था। इसका उद्देश्य भारत और उसकी सीमाओं से 1,500 किलोमीटर तक के क्षेत्र में स्थिति निर्धारण (पोजिशन), नौवहन (नेविगेशन) और समय निर्धारण (टाइमिंग) सेवाएं उपलब्ध कराना है।
नैविक में सात उपग्रहों का समूह है, जिनमें तीन भू-तुल्यकालिक स्थानांतरण कक्षा (जीटीओ) में और जीटीओ कक्षा में हैं। एनवीएस-01 कक्षा में मौजूद है, जबकि एनवीएस-02 विफल हो चुका है। एनवीएस-03 का प्रक्षेपण 30 अक्टूबर को प्रस्तावित है। इसके बाद एनवीएस-04 और एनवीएस-05 का प्रक्षेपण किया जाएगा।
नैविक उपग्रह भारतीय सशस्त्र बलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। इनका उपयोग मिसाइलों के नौवहन, सटीक स्थिति निर्धारण, समुद्र में युद्धपोतों के बीच समन्वय तथा सैनिकों की आवाजाही और लड़ाकू विमानों के संचालन के लिए स्वदेशी नौवहन सहायता उपलब्ध कराने में किया जाता है।
भारतीय सेना के लिए भू-तुल्यकालिक स्थानांतरण कक्षा (जीटीओ) में कम से कम चार नैविक उपग्रहों का होना अनिवार्य है। इससे भारत को रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने और सामरिक बढ़त हासिल करने में मदद मिलेगी। बैलिस्टिक मिसाइलों और सटीक निशाना लगाने वाले हथियारों जैसे आधुनिक सैन्य उपकरणों को प्रभावी ढंग से काम करने के लिए स्थिति निर्धारण, नौवहन और समय निर्धारण (पीएनटी) के सटीक संकेतों की आवश्यकता होती है।
भारत अब तक 11 नौवहन उपग्रह प्रक्षेपित कर चुका है। इनमें से केवल तीन उपग्रह- आईआरएनएसएस-1बी, आईआरएनएसएस-1एल और एनवीएस-01- ही आवश्यक सेवाएं दे रहे हैं। एनवीएस-01 में एल1 बैंड का समर्थन भी जोड़ा गया है। एनवीएस-03 के प्रक्षेपण के बाद सेवाएं देने वाले उपग्रहों की संख्या चार हो जाएगी। एनवीएस-03 के सेवा में आने के बाद इसरो नैविक प्रणाली को सक्रिय कर सकता है।
एनवीएस-03 का सफल प्रक्षेपण नैविक प्रणाली की स्वतंत्र त्रि-आयामी स्थिति निर्धारण सेवाओं को बहाल करने में मदद करेगा। इससे भारतीय सशस्त्र बलों के लिए आवश्यक चार उपग्रहों की अनिवार्य संख्या भी पूरी हो जाएगी।
नैविक दो तरह की सेवाएं उपलब्ध कराता है। पहली, आम नागरिकों के लिए मानक स्थिति निर्धारण सेवा और दूसरी, भारतीय सेना जैसे अधिकृत उपयोगकर्ताओं के लिए एन्क्रिप्टेड प्रतिबंधित सेवा। एनवीएस-02 मिशन की विफलता के बाद मार्च 2016 में प्रक्षेपित आईआरएनएसएस-1एफ उपग्रह को लेकर भी एक चिंता सामने आई। अपनी निर्धारित 10 वर्ष की कार्य अवधि पूरी करने के बाद इस उपग्रह की अंतिम रूबिडियम परमाणु घड़ी ने काम करना बंद कर दिया।
इसरो के अनुसार, "13 मार्च, 2026 को उपग्रह में लगी परमाणु घड़ी ने काम करना बंद कर दिया। हालांकि, उपग्रह कक्षा में काम करता रहेगा और विभिन्न सामाजिक उपयोगों के लिए एकतरफा प्रसारण संदेश सेवाएं उपलब्ध कराता रहेगा।"अट्ठारह मई, 2025 को पीएसएलवी-सी61 और 12 जनवरी, 2026 को पीएसएलवी-सी62 मिशनों में लगातार विफलताओं तथा इससे पहले कक्षा और परमाणु घड़ी से जुड़ी समस्याओं के बाद इसरो ने प्रक्षेपणों के मामले में सतर्कता बरतते हुए जांच और समीक्षा की प्रक्रिया तेज कर दी है।
लगातार दूसरी बार भरोसेमंद और लंबे समय से इस्तेमाल किए जा रहे पीएसएलवी रॉकेट की विफलता के बाद अंतरिक्ष एजेंसी ने प्रक्षेपणों को लेकर सावधानीपूर्ण रुख अपनाया है। इसका उद्देश्य इन विफलताओं के कारण बनी तकनीकी गड़बड़ियों को समझना और उन्हें दूर करना है।
हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित