चेन्नई , जुलाई 09 -- भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने अपने पहले मानव अंतरिक्ष अभियान गगनयान की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम बढ़ाते हुए पैराशूट का हवाई परीक्षण (आईमैट) सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है।

यह आईमैट परीक्षण मंगलवार को मध्य प्रदेश के श्योपुर में हवाई वितरण अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान (एडीआरडीई) में आयोजित किया गया था। यह परीक्षण इसलिए किया गया ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि अंतरिक्ष से लौटते समय अंतरिक्ष यात्रियों को सुरक्षित तरीके से पृथ्वी पर उतारा जा सके।

गगनयान के क्रू मॉड्यूल (जहाँ अंतरिक्ष यात्री बैठेंगे) को सुरक्षित उतारने के लिए कुल 10 पैराशूट लगाए गए हैं। ये चार अलग-अलग प्रकार के होते हैं और एक तय क्रम में खुलते हैं। सबसे पहले '2 एपेक्स कवर पैराशूट' खुलते हैं। इनका काम पैराशूट वाले हिस्से का ढक्कन हटाना होता है। इसके बाद '2 ड्रोग पैराशूट' खुलते हैं। ये अंतरिक्ष यान को संतुलित करते हैं और उसकी तेज़ रफ्तार कम करना शुरू करते हैं।

फिर 3 पायलट पैराशूट खुलते हैं। इनका काम 3 बड़े मुख्य पैराशूट को बाहर निकालना होता है। अंत में 3 मुख्य पैराशूट पूरी तरह खुल जाते हैं। यही पैराशूट क्रू मॉड्यूल की गति बहुत कम कर देते हैं, जिससे वह समुद्र में सुरक्षित उतर सके।

इस परीक्षण में भारतीय वायु सेना के आईएल-76 विमान से लगभग 2.5 किलोमीटर की ऊँचाई से एक मुख्य पैराशूट और उसके साथ एक नकली भार गिराया गया। पहले एक छोटा पैराशूट खोला गया, फिर ड्रोग पैराशूट और अंत में मुख्य पैराशूट खोला गया। मुख्य पैराशूट ने भार की गति को सुरक्षित स्तर तक कम कर दिया।

गगनयान मिशन के लिए मुख्य पैराशूट को परखने की कड़ी में यह पांचवां परीक्षण (आईमैट-05) था। इस परीक्षण के सफल होने से वैज्ञानिकों का भरोसा बढ़ गया है कि बिना गगनयान के लिए पैराशूट सिस्टम पूरी तरह तैयार है। यह कामयाबी इसरो, डीआरडीओ, वायुसेना और थलसेना के आपसी सहयोग से मिली है।

इस टेस्ट से पहले तीन जुलाई को श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र में रॉकेट की गति धीमी करने वाली प्रणाली से जुड़े 'सॉल्व' सॉलिड मोटर का पहला जमीनी परीक्षण भी सफलतापूर्वक किया जा चुका है। गगनयान मिशन का लक्ष्य दो से तीन अंतरिक्ष यात्रियों को पृथ्वी से 400 किलोमीटर ऊपर अंतरिक्ष में ले जाना है, जहां वे 3 दिन बिताएंगे और फिर उन्हें सुरक्षित वापस लाकर समुद्र में उतारा जाएगा। इस अंतरिक्ष यान में मुख्य रूप से दो हिस्से हैं-पहला अंतरिक्ष यात्रियों के बैठने का केबिन और दूसरा सफर में मदद करने वाला सर्विस मॉड्यूल।

इसरो ने कहा कि इस मिशन को पूरा करने के लिए भारत के उद्योगों, वैज्ञानिकों और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की आधुनिक तकनीकों और अनुभवों की मदद ली जा रही है। असली मिशन से पहले कई ऐसे परीक्षण अभियान भेजे जाएंगे जिनमें इंसान नहीं होंगे, ताकि सभी प्रणालियों की सुरक्षा को अच्छे से परखा जा सके। इनमें अंतरिक्ष यात्रियों के लिए ऑक्सीजन और पृथ्वी जैसा माहौल तैयार करना, आपातकाल में उन्हें सुरक्षित बाहर निकालने की तकनीक और उनकी प्रशिक्षण शामिल है।

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