चेन्नई , जनवरी 10 -- भारतीय अतंरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) 12 जनवरी को अपने पीएसएलवी-सी 62 प्रक्षेपण यान से आठ विदेशी पेलोड सहित कुल 16 उपग्रहों को कक्षा में भेजेगा।

कक्षा में भेजे जाने वाले इन विदेशी पेलोड में स्पेन की अंतरिक्ष स्टार्टअप 'ऑर्बिटल पैराडाइम' का केस्ट्रल इनिशियल टेक्नोलॉजी डिमॉन्स्ट्रेटर (केआईडी) भी शामिल है। केआईडी को पीएसएलवी के उड़ान भरने के लगभग 108 मिनट बाद 504 किमी की ऊंचाई पर अंतरिक्ष में छोड़ा जाएगा।

गौरतलब है कि केआईडी एक 'रीएंट्री कैप्सूल' है, जिसे नौ सदस्यीय इंजीनियरिंग टीम द्वारा सिर्फ एक साल में विकसित किया गया है। हालांकि, इस कैप्सूल को वापस बरामद नहीं किया जाएगा, क्योंकि इसमें पैराशूट नहीं लगा है। इसकी बजाय, यह वायुमंडल में फिर से प्रवेश करने से पहले पेलोड डेटा प्रसारित करेगा।

भारत के अंतरिक्ष विभाग की वाणिज्यिक शाखा 'न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड' (एनएसआईल) ने कहा कि उड़ान भरने के लगभग 18 मिनट बाद पीएसेलवी-सी62 अपने प्राथमिक पेलोड यानि कि भारत के पृथ्वी अवलोकन उपग्रह ईओएस-एन1 के साथ 14 अन्य उपग्रहों को कक्षा में स्थापित करेगा।

इसके बाद रॉकेट का चौथा चरण फिर से शुरू होगा। यह 'डी-बूस्ट' करेगा और फिर से वायुमंडल में प्रवेश (रीएंट्री) के करने के लिए आगे बढ़ेगा, तब केआईडी रॉकेट से अलग हो जाएगा। इसके बाद पीएसएलवी का चौथा चरण और केआईडी कैप्सूल दोनों पृथ्वी के वायुमंडल में पुनः प्रवेश करेंगे और संभवत: दक्षिण प्रशांत महासागर में गिरने की संभावना है।

पीएसएलवी-सी62 पर एक अन्य उल्लेखनीय विदेशी पेलोड ब्राजीलियाई कंपनी 'ऑल्टोस्पेस' का 'ऑर्बिटल टेम्पल' है। यह 'पॉकेटक्यूब' उपग्रह है, जिसे 525 किमी की ऊंचाई पर एक सूर्य-तुल्यकालिक कक्षा में रखा जाएगा।

ऑल्टोस्पेस चार अतिरिक्त उपग्रह भी भेज रहा है, जिनमें 'एड्यूसैट' शामिल है, जो ब्राजील में इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी) सेंसर का प्रदर्शन करेगा।

इस मिशन में थाईलैंड के लिए ब्रिटेन की कंपनी एसएसटीएल द्वारा निर्मित पृथ्वी अवलोकन उपग्रह 'थियोस-2' और एक नेपाली विश्वविद्यालय का तकनीकी प्रदर्शन उपग्रह 'मुनाल' भी शामिल होगा।

गौरतलब है कि इससे पहले इसरो ने अब तक कुल 434 उपग्रहों का प्रक्षेपण किया है। भारत ने सबसे पहले मई 1999 में विदेशी उपग्रह प्रक्षेपित किया था, जब पीएसएलवी-सी2 प्रक्षेपण यान की मदद से अपने 'ओशनसैट' उपग्रह के साथ दक्षिण कोरिया के 'किटसैट-3' और जर्मनी के 'डीएलआर ट्यूबसैट' को सफलतापूर्वक कक्षा में स्थापित किया था।

इसरो शुरआत में एकमात्र रॉकेट पीएसएलवी पर अपने उपग्रहों के साथ छोटे विदेशी उपग्रहों को केवल 'सहायक सामग्री' के रूप में ले जाता था।

इसरो ने अप्रैल 2007 में सबसे पहले अपना पूर्ण व्यावसायिक रॉकेट पीएसएलवी-सी8 प्रक्षेपित किया, जो 350 किलोग्राम वजनी इतालवी उपग्रह 'एजाइल' को ले गया था। यह उस समय किसी भारतीय प्रक्षेपण यान द्वारा कक्षा में भेजा गया अब तक का सबसे भारी विदेशी उपग्रह था।

उसके बाद, इसरो को अपने छोटे उपग्रहों को कक्षा में भेजने के लिए विदेशी ग्राहकों से नियमित ऑर्डर मिलने लगे, जो या तो भारतीय उपग्रहों पर 'पिगीबैक' के रूप में या कुछ मामलों में, प्राथमिक पेलोड के रूप में भेजे गए।

अधिकांश विदेशी उपग्रहों को पीएसएलवी रॉकेट द्वारा कक्षा में भेजा गया। इसरो के स्मॉल सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (एसएसएलवी) ने 2023 में एक अमेरिकी उपग्रह 'जेनस' (10.2 किलोग्राम) को कक्षा में भेजा था। गौरतलब है कि एसएसएलवी का निर्माण 500 किलोग्राम और उससे कम के छोटे उपग्रह प्रक्षेपण बाजार की जरूरतों को पूरा करने के दृष्टिकोण से किया गया है।

एकमात्र भारतीय रॉकेट जिसे कोई उपग्रह प्रक्षेपण ऑर्डर नहीं मिला है, वह जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (जीएसएलवी) है।

भारी पेलोड ले जाने में सक्षम रॉकेट एलवीएम3 को ब्रिटेन के 'वनवेब' कंपनी से 72 संचार उपग्रहों को कक्षा में भेजने का पहला बड़ा ऑर्डर मिला था, जिसमें से 36 उपग्रह 2022 में और 36 उपग्रह 2023 में भेजे गए थे।

एलवीएम3 ने और 2025 में सफलतापूर्वक एक अमेरिकी कंपनी एएसटी स्पेसमोबाइल के 'ब्लूबर्ड 6' को अंतरिक्ष में पहुँचाया, जिसका वजन लगभग 6,100 किलोग्राम था।

हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित