इटावा , अक्टूबर 06 -- चंबल इलाके से जुड़े उत्तर प्रदेश के इटावा में बसरेहर विकासखंड के ख़रीदूली गांव स्थित उच्च प्राथमिक विद्यालय दुर्लभ प्रजापत के काले काले कौवे का सबसे बड़ा आशियाना बन गया है।
स्थानीय लोगों की बात को अगर सही ढंग से माना जाए तो करीब 2000 की संख्या में दुर्लभ प्रजाति के कौवे गांव को अपना आशियाना बना रहे हैं।एक अनुमान के मुताबिक 2000 के आसपास कौवे स्कूल और गांव में घरों और पेड़ों पर भ्रमण करते हुए नजर आ रहे हैं। बड़ी संख्या में कौओं को देख कर लोगो ने कहना शुरू कर दिया है कि विलुप्त हो रहे कौआ का सबसे बड़ा आशियाना स्कूल ओर खरदूली गांव बन गया हैं।
श्राद्ध पक्ष में भोज के बाद कौवों की बड़ी जरूरत महसूस होती है इसलिए श्राद्ध करने वाले ग्रामीण स्कूल में कौवों को भोज कराने पहुंच रहे है।
इस उच्च प्राथमिक स्कूल में कौओ की हजारों की संख्या को देखकर के पर्यावरण विशेषज्ञ भी हैरत में पड़ गए हैं कि इतनी बड़ी तादात में कौवे एक स्थान पर कैसे एक जुट हो रहे है।
विलुप्त हो रहे कौवों के हजारों की संख्या में यहां एकजुट होने के पीछे प्राथमिक स्कूल में तैनात सहायक अध्यापिका श्रीमती सुनीता यादव के अथक मेहनत और प्रेरणा माने जा रही है। श्रीमती यादव ने स्कूल के शिक्षक शिक्षिकाओं के साथ-साथ स्कूली बच्चों को भी इस बात का संदेश दिया है कि पर्यावरण के प्रति हमेशा सजग रहे जिसका जीता जाता नमूना यह देखने को मिल रहा है कि यहां कौवा की हजारों की संख्या पहुंचना शुरू हो गई है।
उन्होंने स्कूल के शिक्षक शिक्षकों के साथ-साथ छात्र-छात्राओं को भी इस बात का संदेश दिया है कि अपने भोजन का कुछ हिस्सा पक्षियों के खाने के लिए डाला जाए ।
सुनीता यादव की बात को मानने और सुनने के बाद शिक्षक शिकाओं के साथ-साथ स्कूली छात्र-छात्राओं ने भी अपने भोजन का कुछ हिस्सा पक्षियों के लिए डालना शुरू किया तो अन्य पक्षियों के अलावा कौवा ने बड़ी संख्या में आना शुरू कर दिया आज हजारों की संख्या स्कूल में कौवा की जमा होना शुरू हो गई है।
स्कूल के शिक्षक शरद यादव सहायक शिक्षा का सुनीता यादव की पर्यावरणीय पहल की तारीफ करते हुए बताते है कि पर्यावरण से जुड़ी शिक्षिका की प्रेरणा से उनके प्राथमिक स्कूल में बड़ी संख्या में कौवे की मौजूदगी कहीं ना कहीं स्थानीय लोगों को बेहद खुश कर रही है। उनका कहना है कि सुनीता यादव जिस तरह से पर्यावरण के प्रति सजग और संवेदनशील बनी हुई है जाहिर है कि उनकी मेहनत का असर भी व्यापक पैमाने पर दिखाई दे रहा है तभी उनके प्राथमिक स्कूल में कौवों के अलावा बड़ी संख्या में पक्षियों की आवाजाही शुरू हो गई है।
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