इटावा , मई 16 -- कभी राजतिलक जैसे धार्मिक अनुष्ठानों में पवित्र माने जाने वाला यमुना नदी का जल आज प्रदूषण के गंभीर संकट से जूझ रहा है। स्थिति यह है कि नदी का पानी इतना दूषित हो चुका है कि स्थानीय लोग इसे छूने से भी परहेज कर रहे हैं। धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जाने वाली यमुना अब कई स्थानों पर "कचरे के नाले" जैसी स्थिति में पहुंच गई है।

जिले में यमुना की जलधारा पर गंभीर प्रदूषण का प्रभाव देखा जा रहा है। शहर सहित लगभग 25 गांवों का गंदा पानी बिना शोधन के सीधे यमुना में गिर रहा है, जिससे नदी की गुणवत्ता लगातार बिगड़ती जा रही है। यमुना सफाई योजना की समीक्षा बैठक में डीएफओ विकास नायक ने एसटीपी (सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट) की प्रगति पर सवाल उठाते हुए कहा कि पिछले 8-9 महीनों से केवल आश्वासन दिए जा रहे हैं, जबकि एसटीपी अब तक पूरी तरह से चालू नहीं हो सका है। उन्होंने बताया कि बिना शोधन के अपशिष्ट जल सीधे नदी में प्रवाहित हो रहा है, जो गंभीर चिंता का विषय है।

उन्होंने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिए कि आउटलेट सैंपल की जांच कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट की जाए तथा नदी में ठोस अपशिष्ट के प्रवाह को रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाएं। साथ ही नगर निगम को यमुना किनारे फैले कूड़े-कचरे की शीघ्र सफाई कराने के निर्देश भी दिए गए।

अधिकारियों के अनुसार आगरा से इटावा तक पहुंचते-पहुंचते यमुना की जलधारा अत्यधिक प्रदूषित हो जाती है। शहर के घाटों पर नियमित सफाई न होने से स्थिति और खराब होती जा रही है।

बढ़पुरा और चकरनगर क्षेत्र के लगभग 25 गांवों जिनमें सुनबारा, भटपुरा, रम्पुरा, जरहोली, गढ़िया गुलाब सिंह, नौगवां, डिभौली, निवी, चकरपुरा, नीमाडाढ़ा, अमदापुर सहित कई गांव शामिल हैं, का गंदा पानी सीधे यमुना में जा रहा है। स्थानीय लोगों ने कई बार शिकायतें कीं, लेकिन अब तक नालों को बंद करने की दिशा में ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।

विशेषज्ञों के अनुसार प्रदूषण का असर स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है। खाद्य सुरक्षा मानकों के मुताबिक सीमित मात्रा से अधिक लेड मिलने के कारण यमुना किनारे उगाई जाने वाली सब्जियों से न्यूरोलॉजिकल समस्याएं, याददाश्त संबंधी विकार, फेफड़ों और पेट से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है।

स्थानीय स्तर पर सुझाव दिए जा रहे हैं कि यमुना किनारे पुराने घाटों की सफाई और पुनर्स्थापना की जाए, ठोस अपशिष्ट रोकने के लिए संरचनात्मक उपाय किए जाएं, तथा सभी नालों का पानी पूर्ण शोधन के बाद ही नदी में छोड़ा जाए। साथ ही धार्मिक सामग्री और मूर्तियों के विसर्जन के लिए अलग व्यवस्था विकसित करने की भी मांग उठ रही है।

समाजसेवियों और स्थानीय यमुना प्रहरी संगठनों का कहना है कि यदि ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाला प्रदूषित जल नहीं रोका गया तो नदी की स्थिति और गंभीर हो जाएगी। वहीं, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि उचित प्रबंधन के जरिए यमुना घाटों को फिर से पर्यटन और तीर्थस्थल के रूप में विकसित किया जा सकता है।

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