देवरिया , जुलाई 27 -- उत्तर प्रदेश में देवरिया जिला मुख्यालय से लगभग 20 किलोमीटर दूर रुद्रपुर स्थित प्राचीन दुग्धेश्वरनाथ मंदिर आस्था, इतिहास और पुरातात्विक महत्व का अद्वितीय संगम है।

स्वयंभू शिवलिंग, बौद्धकालीन ईंटों से निर्मित मंदिर और प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग के उल्लेख के कारण इसे पूर्वांचल की "छोटी काशी" के नाम से भी जाना जाता है। श्रावण मास में यहां उत्तर प्रदेश के अलावा बिहार और नेपाल से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु जलाभिषेक के लिए पहुंचते हैं।

मंदिर के पुजारियों के अनुसार यहां स्थापित शिवलिंग स्वयंभू है और इसकी लंबाई पातालगामी मानी जाती है। श्रद्धालुओं को जलमग्न शिवलिंग के दर्शन एवं स्पर्श के लिए लगभग 14 सीढ़ियां नीचे उतरना पड़ता है। शिवलिंग वर्षभर भक्तों द्वारा अर्पित दूध और जल से आच्छादित रहता है, जिसके कारण इसका नाम दुग्धेश्वरनाथ पड़ा।

श्रावण मास और अधिक मास में मंदिर परिसर में विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं। एक माह तक चलने वाले मेले में हजारों श्रद्धालु रुद्राभिषेक, जलाभिषेक और पूजा-अर्चना करते हैं। इस दौरान दूर-दराज से आने वाले व्यापारी भी अस्थायी दुकानें लगाते हैं।

मंदिर की ऐतिहासिक महत्ता का उल्लेख करते हुए पुजारियों का कहना है कि सातवीं शताब्दी में भारत आए प्रसिद्ध चीनी बौद्ध यात्री ह्वेनसांग ने भी इस मंदिर का भ्रमण किया था। मान्यता है कि मंदिर की भव्यता और धार्मिक महत्व से प्रभावित होकर उन्होंने मंदिर परिसर की दीवार पर चीनी भाषा में टिप्पणी अंकित की थी, जिसके चिह्न आज भी अस्पष्ट रूप में दिखाई देने की बात कही जाती है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार प्राचीन काल में यह पूरा क्षेत्र घने जंगलों से आच्छादित था। यहां चरने आने वाली एक गाय प्रतिदिन एक टीले पर खड़ी होकर स्वतः दूध की धारा प्रवाहित करती थी। यह बात तत्कालीन सतासी राज्य के राजा हरी सिंह तक पहुंची। काशी के विद्वानों की सलाह पर जब उस स्थान की खुदाई कराई गई तो वहां शिवलिंग प्रकट हुआ मगर उसे बाहर निकालने का प्रयास करने पर वह और अधिक धरती के भीतर धंसता चला गया। इसे स्वयंभू शिवलिंग मानकर वहीं उसकी पूजा-अर्चना प्रारंभ कर दी गई।

मान्यता है कि 11वीं शताब्दी में राजा हरी सिंह ने काशी के विद्वानों की देखरेख में यहां अष्टकोणीय मंदिर का निर्माण कराया। मंदिर निर्माण में प्रयुक्त ईंटों को बौद्धकालीन माना जाता है। बताया जाता है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पटना कार्यालय के अभिलेखों में भी इस मंदिर का उल्लेख नाथ बाबा के नाम से मिलता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शिवपुराण और स्कंदपुराण में भी इस तीर्थ का उल्लेख मिलता है। इसे उज्जैन स्थित महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का उपलिंग तथा द्वादश ज्योतिर्लिंगों के समान आध्यात्मिक महत्व प्राप्त होने की मान्यता है। आस्था, प्राचीन इतिहास, पुरातात्विक महत्व और लोकमान्यताओं के अद्भुत समन्वय के कारण रुद्रपुर का दुग्धेश्वरनाथ मंदिर आज भी पूर्वांचल के प्रमुख शिवधामों में विशेष स्थान रखता है और प्रत्येक वर्ष लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है।

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