जालौन , मार्च 19 -- उत्तर प्रदेश के जालौन जिले में यमुना तट पर बीहड़ों के बीच स्थित जालौन देवी के नाम से प्रसिद्ध जयंती माता मंदिर आज भी श्रद्धा, रहस्य और प्राचीन इतिहास का जीवंत केंद्र बना हुआ है।

बुंदेलखंड अंचल में इस मंदिर की विशेष मान्यता है और दूर-दूर से श्रद्धालु यहां दर्शन-पूजन के लिए पहुंचते हैं। प्राकृतिक सौंदर्य, बीहड़ों की गहराई और यमुना का शांत प्रवाह इस धाम को और अधिक दिव्य बना देता है।

मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि द्वापर युग में पांडव अपने वनवास और अज्ञातवास के दौरान इस क्षेत्र में पहुंचे थे। उस समय यह पूरा इलाका घने जंगलों और बीहड़ों से घिरा हुआ था, जहां साधना के लिए उपयुक्त वातावरण था। पांडवों ने महर्षि वेदव्यास के मार्गदर्शन में यहां मां चंडी देवी की कठोर तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें दर्शन दिए और कौरवों के विरुद्ध युद्ध में विजय का आशीर्वाद प्रदान किया। इसी "जय" के आशीर्वाद के कारण यह देवी "जयंती माता" के नाम से विख्यात हुईं।

मंदिर में स्थापित मां जयंती का विग्रह लगभग 5000 वर्ष पुराना माना जाता है। यह प्राचीन प्रतिमा आज भी श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बनी हुई है। मान्यता है कि यहां की गई पूजा-अर्चना का फल कई गुना अधिक प्राप्त होता है और सच्चे मन से मांगी गई हर मनोकामना पूर्ण होती है।

माधौगढ़ तहसील के अंतर्गत ग्राम कंझारी के पास यमुना नदी के किनारे स्थित यह मंदिर जालौन खुर्द ग्राम पंचायत की सीमा में आता है। बीहड़ों के बीच स्थित होने के कारण इसका वातावरण अत्यंत रहस्यमयी और आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करता है। कभी यह क्षेत्र चंबल के कुख्यात बीहड़ों के रूप में जाना जाता था, लेकिन इसके बावजूद मंदिर की पवित्रता और महत्व हमेशा बना रहा।

इतिहास के एक दौर में यह मंदिर चंबल के कुख्यात डकैतों की आस्था का भी केंद्र रहा। मानसिंह, मलखान सिंह और फूलन देवी जैसे कई डकैत गुप्त रूप से यहां आकर माता के दर्शन करते थे और अपनी सुरक्षा के लिए प्रार्थना करते थे। स्थानीय लोगों का मानना है कि मां जयंती की कृपा से ही वे कठिन परिस्थितियों में भी सुरक्षित रहते थे। यही कारण है कि बीहड़ों के बीच स्थित यह मंदिर उस दौर में भी सुरक्षित रहा।

मंदिर से जुड़े कई चमत्कारी प्रसंग भी प्रचलित हैं। श्रद्धालुओं का कहना है कि यहां आकर की गई प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं जाती। कई लोगों ने अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन और कठिनाइयों से मुक्ति का अनुभव किया है। मंदिर के पुजारियों के अनुसार, विशेषकर रात के समय यहां देवी शक्ति का अद्भुत आभास होता है, जिसे कई श्रद्धालु महसूस कर चुके हैं।

जयंती माता मंदिर केवल जालौन तक सीमित नहीं है, बल्कि झांसी, इटावा, औरैया, कानपुर, हमीरपुर, भिंड, मुरैना और ग्वालियर सहित कई जनपदों के लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। प्रतिदिन सैकड़ों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं, जबकि नवरात्रि के अवसर पर यह संख्या हजारों में पहुंच जाती है।

ब्लॉक प्रमुख कुठौंद अजीत सिंह ने बताया कि हर वर्ष की भांति चैत्र नवरात्रि एवं हिंदी नववर्ष के अवसर पर यहां "मां जालौन देवी महोत्सव 2026" का भव्य आयोजन किया जा रहा है। 19 मार्च से 25 मार्च तक प्रतिदिन शाम 7 बजे से रात्रि 11 बजे तक भव्य भजन संध्या का आयोजन होगा, जिसमें देश-प्रदेश के ख्यातिप्राप्त भजन गायक अपनी प्रस्तुतियां देंगे। इसके साथ ही आकर्षक झांकियां महोत्सव का विशेष आकर्षण होंगी, जिनमें मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों का जीवंत चित्रण किया जाएगा।

महोत्सव के दौरान 19 मार्च से 27 मार्च तक प्रतिदिन सुबह 10 बजे से शाम 4 बजे तक विशाल भंडारे का आयोजन भी किया जाएगा, जिसमें हजारों श्रद्धालु प्रसाद ग्रहण करेंगे। मंदिर परिसर को रंग-बिरंगी रोशनी और सजावट से भव्य रूप दिया जा रहा है।

मंदिर के मुख्य पुजारी सर्वेश महाराज के अनुसार यह स्थान एक सिद्धपीठ है, जहां मां जयंती स्वयं विराजमान हैं। वहीं पुजारी मदन शुक्ला का कहना है कि यहां की गई साधना और पूजा का प्रभाव कई गुना अधिक होता है और मां अपने भक्तों की हर मनोकामना पूर्ण करती हैं।

हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित