नई दिल्ली , जनवरी 29 -- आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में व्यवसायों, नागरिकों और नीति-निर्माताओं के सामने ' एक सरल लेकिन कठोर सच्चाई को' रखते हुए कहा गया है कि राष्ट्रीय समृद्धि जितनी नीतियों या संसाधनों पर निर्भर करती है उतनी ही मानव व्यवहार और कॉरपोरेट संस्कृति पर भी निर्भर करती है।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा संसद में आज प्रस्तुत सर्वेक्षण में इस संबंध में तर्क दिया गया है कि रोज़मर्रा के जीवन में आसानी के लिए अपनाए जाने वाले आड़े तिरछे रास्ते, उतावलापन और अनुपालन में अनौपचारिक व्यवहार भारत की आर्थिक वृद्धि और 2047 तक एक विकसित राष्ट्र बनने की उसकी क्षमता को दबे छुपे ढंग से कमजोर कर रहे हैं। इसमें कहा गया है , ' राज्य की क्षमता-अर्थात सरकार की "सही काम सही ढंग से करने" की योग्यता-केवल संस्थानों से नहीं, बल्कि नागरिकों और निजी क्षेत्र के चुनावों से भी आकार लेती है।"आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है कि जब आम लोग यह मान लेते हैं सार्वजनिक स्थानों के प्रति उनमें से किसी की ज़िम्मेदारी नहीं है, नियमों के अनुपालन में कोताही बरती जाती है या बिना कुछ किये फल पाने की इच्छा की जाती है तो सरकारी मशीनरी नियम कायदों लागू करने के काम में ही उलझ जाती है।

इसी संदर्भ में कहा गया है कि लोगों की अधीरता और उतावलेपन की कीमत सड़कों, नालियों और सार्वजनिक प्रणालियों की बदहाली के रूप में चुकानी पड़ती है, जैसा कि सर्वेक्षण में उल्लेख किया गया है।

सर्वेक्षण में कॉरपोरेट क्षेत्र के व्यवहार को भी कसौटी पर कसा गया है और कहा गया है कि भारतीय कंपनियाँ अक्सर एक "हाइब्रिड (संकर किस्म के संतुलन) में काम करती हैं, जहाँ बाज़ार अनुशासन का स्थान राजनीतिक बीच-बचाव और मनमर्जी ले लेती है।

सर्वेक्षण में कहा गया है कि भारत के विपरीत अमेरिका, जर्मनी, जापान, कोरिया, ताइवान और सिंगापुर की कंपनियों ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अपनी दीर्घकालिक क्षमता, कौशल विकास और निर्यात में निवेश किया और मुनाफे को राष्ट्रीय उद्देश्य से सचेत रूप से जोड़ा। संदेश स्पष्ट है-उत्पादकता-आधारित और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी कंपनियाँ न केवल स्वयं फलती-फूलती हैं, बल्कि सार्वजनिक संस्थानों को भी मजबूत करती हैं, जिससे पूरे समाज को लाभ पहुँचाने वाला सकारात्मक चक्र बनता है।

सर्वेक्षण में कंपनियों को संतुष्टि के लिए सब्र करने की सलाह दी गयी जो चर्चा का विषय बन सकती है। सर्वेक्षण रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक बाज़ारों में प्रतिस्पर्धा करने के लिए अल्पकालिक लागतों को स्वीकार करना पड़ता है, जिनका लाभ अनिश्चित होता है और उनमें तुरंत दिखाई नहीं देती।

मुख्य आर्थिक सलाह कार डॉ वी अनंत नागेश्वर द्वारा लिखी गयी सर्वे रिपोर्ट में कहा गया है, ' जहाँ अधीरता हावी हो जाती है-चाहे वह कॉरपोरेट निर्णय-निर्माण हो, खेल जगत हो या रोज़मर्रा का नागरिक आचरण-वहाँ सीखने की जगह 'शॉर्टकट' ले लेता है, विश्वसनीयता घटती है और संस्थान तथा कौशल दोनों कमजोर पड़ते हैं।' सर्वेक्षण कहता है कि इसका एक उदाहण खेलों में डोपिंग के नियमों का उल्लंघन है।

सर्वेक्षण अनुपालन के बोझ में कटौती और विनियमन को कम करने की पहल को सरकार की परिचालन क्षमता के एक महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में भी प्रस्तुत करता है। इसी संदर्भ में कहा गया है कि जनवरी 2025 में कैबिनेट सचिव के नेतृत्व में शुरू की गई इस टास्क फोर्स ने 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 23 प्राथमिक क्षेत्रों में नियमों की समीक्षा की है। इसके तहत अनुमोदनों को सरल बनाया गया, अनावश्यक नियम हटाए गए और डिजिटल, जोखिम-आधारित तथा तृतीय-पक्ष तंत्र लागू किए गए।

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