नयी दिल्ली , जनवरी 29 -- आर्थिक सर्वेक्षण में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के लिए भारत-केंद्रित विशिष्ट रोडमैप पेश करते हुए नीति निर्माताओं से आग्रह किया गया है कि वे बड़े वैश्विक प्रौद्योगिकी मॉडलों की नकल से बचें और भारत की जनसांख्यिकीय शक्ति, विविधतापूर्ण डेटा और संस्थागत क्षमता पर आधारित रणनीति विकसित करें।

लोकसभा में गुरुवार को पेश आर्थिक सर्वेक्षण में 'भारत में एआई पारिस्थितिकी तंत्र का विकास: भविष्य का मार्ग' अध्याय में जोर देकर कहा गया है कि "सावधानीपूर्वक क्रमबद्ध कदम , श्रम-संवेदनशील नीति ढांचे, संतुलित डेटा गवर्नेंस और मानव पूंजी सुधारों" के माध्यम से यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि एआई "उत्पादकता और सम्मानजनक कार्य को बढाये " न कि आर्थिक असमानताओं को बढ़ाए।

सर्वेक्षण में दलील दी गयी है कि एआई के युग में भारत का तुलनात्मक लाभ विदेशी मॉडल का पीछा करने में नहीं, बल्कि "एप्लिकेशन-आधारित नवाचार, घरेलू डेटा का उत्पादक उपयोग, मानव पूंजी की मजबूती, और सार्वजनिक संस्थानों की प्रयासों का समन्वय करने की क्षमता" में निहित है।

सर्वेक्षण में कहा गया है कि ए आई के युग में ऐसा समन्वित दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए जिसमें ऐसे क्षेत्रों को भी प्रोत्साहित किया जा सके जिनमें ए आई की भूमिका ज्यादा नहीं हो सकती ताकि युवाओं के लिए सम्मानजनक रोजगार के अवसर सृजित किया जा सके। वैश्विक स्तर पर एआई अपनाने की गति तेज़ हो रही है, जिसमें "2025 में सर्वेक्षण किए गए 88 प्रतिशत संगठन" पहले ही कम से कम एक व्यावसायिक कार्य में एआई का उपयोग कर रहे हैं, लेकिन यह भी रेखांकित किया गया है कि बड़े फाउंडेशनल मॉडल बनाने की क्षमता "कुछ बड़ी फर्मों के हाथों में केंद्रित" है, जिनके पास उन्नत चिप्स और विशाल कंप्यूटिंग शक्ति है।

सर्वेक्षण कहता है कि भारत के लिए "केवल अपने उद्देश्य के लिए पैमाना अपनाना न तो कुशल है और न ही आवश्यक है," और पूंजी, अवसंरचना और ऊर्जा की सीमाओं का हवाला देते हुए यह सुझाव देता है कि घरेलू आवश्यकताओं के अनुरूप डोमेन-केंद्रित एआई सिस्टम विकसित किए जाएँ।

रोज़गार पर, सर्वेक्षण ने उत्पादकता और नौकरियों के बीच बढ़ते तनाव की ओर ध्यान आकर्षित किया है। एआई "पूंजी की उत्पादकता को श्रम की तुलना में बढ़ाता है," विशेष रूप से सफेदपोश सेवाओं में, जिससे नियमित भूमिकाओं में स्वचालन का जोखिम बढ़ जाता है। श्रम-समृद्ध अर्थव्यवस्था के लिए, "तेज़ और बिना मापदंड के तैनाती" नए अवसरों के उत्पन्न होने से पहले ही श्रमिकों को विस्थापित कर सकती है।

चुनौती यह नहीं है कि एआई को अपनाना है या नहीं बल्कि यह है कि इसकी गति इस तरह तय की जाए कि इसका प्रतिकूल प्रभाव न हो।

सर्वेक्षण ने बुनियादी कौशल क्षेत्रों और सीखने के क्षेत्र में निवेश करने का भी आह्वान किया और तर्क दिया कि एआई के युग में दीर्घकालिक रोजगार योग्यता विशेषज्ञता की तुलना में साक्षरता, तर्क क्षमता, संचार और सामाजिक-भावनात्मक कौशल पर अधिक निर्भर करेगी। सर्वेक्षण में निष्कर्ष निकाला गया है कि एआई को ऐसे "रणनीतिक विकल्प" के रूप में देखा जाना चाहिए, जो आर्थिक रूप से आधारित, सामाजिक रूप से संवेदनशील और व्यापक समृद्धि की दिशा में सक्षम हो।

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