बेंगलुरु , अक्टूबर 30 -- बेंगलुरु के आर्कबिशप पीटर माचाडो ने शुक्रवार को कर्नाटक सरकार पर धर्मांतरण विरोधी कानून को रद्द करने के अपने चुनावी वादे को पूरा करने का दबाव बनाया। उन्होंने सरकार को आगामी बेलगावी शीतकालीन सत्र के दौरान इस कानून को वापस लेने को कहा दी और सावधान किया कि ऐसा न करने पर अल्पसंख्यक समुदायों के बीच कांग्रेस पार्टी की साख खत्म होने का खतरा पैदा हो सकता है।

2022 में तत्कालीन भाजपा सरकार के बनाए गए इस कानून को पूरी तरह रद्द करने के बजाय कुछ प्रावधानों में संशोधन करने की सरकार की मंशा को खारिज करते हुए श्री मचाडो ने कहा कि ईसाई समुदाय ऐसे आधे-अधूरे उपायों से संतुष्ट नहीं है और इसे पूरी तरह समाप्त करना चाहता है।

कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणापत्र में सत्ता में आते ही इस कानून को वापस लेने का वादा किया था, तीन वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बाद भी हालांकि यह प्रतिबद्धता अधूरी है। उन्होंने इस देरी पर गहरी निराशा व्यक्त की।

अल्पसंख्यक, दलित और किसान संगठनों की एक संयुक्त पत्रकार वार्ता को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, "जहां तक मेरी जानकारी है, पिछले जुलाई से ही उनके पास पर्याप्त संख्या बल है। इसलिए बेलगावी में आयोजित होने जा रहे इस शीतकालीन सत्र में कानून वापस लेने से उन्हें कोई नहीं रोक सकता।"श्री माचाडो ने उन संशोधनों को स्वीकार करने से साफ इनकार कर दिया, जो दंडात्मक प्रावधानों सहित कानून की कठोरता को केवल कम करते हों।

उन्होंने कहा, "यह किसी कमरे में बिना दांत वाले सांप को छोड़ने जैसा है। दांत भले न हों, फिर भी सांप डरावना ही रहता है। इसे पूरी तरह हटाएं और साबित करें कि आप एक अलग सोच वाली कांग्रेस सरकार हैं।" उन्होंने तर्क दिया कि कानून के कुछ हिस्सों को बनाए रखना और दूसरों में संशोधन करना इसे रद्द करने की मूल मांग के उद्देश्य को ही विफल कर देगा।

राजनीतिक परिणामों की चेतावनी देते हुए आर्कबिशप ने कहा कि घोषणापत्र के वादे को पूरा न करने से कांग्रेस में ईसाइयों और मुसलमानों का विश्वास टूट सकता है।

उन्होंने कहा, "यदि लोगों को उनके अधिकारों से वंचित रखा गया, तो मुझे नहीं लगता कि भविष्य में लोग कांग्रेस के वादों पर भरोसा करेंगे।"यह स्पष्ट करते हुए कि यह मांग चुनावी गणित से प्रेरित नहीं है श्री माचाडो ने कहा कि वह पिछले तीन वर्षों से लगातार इस मुद्दे को उठा रहे हैं और अगले विधानसभा चुनावों का इंतजार नहीं कर रहे थे।

संवाददाता सम्मेलन में सांप्रदायिक रूप से भड़काऊ बयानों से अल्पसंख्यकों और दलितों की सुरक्षा के लिए प्रस्तावित 'हेट स्पीच कानून' को प्रभावी ढंग से लागू करने की मांग भी की गई।

गोहत्या विरोधी कानून पर श्री मचाडो ने कहा कि इसका असर केवल मुसलमानों पर ही नहीं, बल्कि किसानों और दलितों पर भी पड़ रहा है, विशेष रूप से उन लोगों पर जो बुजुर्ग और अनुत्पादक मवेशियों की देखभाल करने में असमर्थ हैं। उन्होंने इसे रद्द करने की मांग करते हुए कहा कि ऐसे पशुओं को गौशालाओं में रखना हर जगह व्यावहारिक समाधान नहीं है।

आर्कबिशप ने कहा कि ईसाई, मुस्लिम, दलित, किसान, लेखक और कई गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) इन चिंताओं को उठाने के लिए एकजुट हैं।

हालिया मतदाता सूची पुनरीक्षण से अल्पसंख्यकों के प्रभावित होने के आरोपों पर उन्होंने कहा कि वह इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं कर सकते, लेकिन उन्होंने सरकार से अपील की कि वह मतदाता सूची से छूटे पात्र नागरिकों की औपचारिकताएं पूरी कराकर उनका नाम शामिल कराने में मदद करे।

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