नयी दिल्ली , जून 15 -- भारत की पारंपरिक ज्ञान विरासत को संरक्षित करने के उद्देश्य से सोमवार को कर्नाटक के उडुपी में तिगलारी और पुरानी कन्नड़ लिपियों में लिखी आयुर्वेद पांडुलिपियों के लिप्यंतरण पर एक क्षमता-निर्माण कार्यशाला का उद्घाटन किया गया।

आयुष मंत्रालय ने आज बताया कि यह कार्यशाला भारत सरकार के आयुष मंत्रालय के तहत संचालित आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान केंद्रीय परिषद (सीसीआरएएस) और भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के तहत संचालित केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय (सीएसयू) द्वारा श्री वदिराजा अनुसंधान फाउंडेशन के सहयोग से संयुक्त रूप से आयोजित की गई। इस पहल का उद्देश्य कर्नाटक के तटीय क्षेत्रों में प्रमुखता से पाई जाने वाली तिगलारी और प्राचीन कन्नड़ लिपियों में संरक्षित आयुर्वेद पांडुलिपियों को पढ़ने, समझने और लिपिबद्ध करने में विद्वानों की विशेषज्ञता का विकास करना है।

सीसीआरएएस के महानिदेशक प्रोफेसर वैद्य रबीनारायण आचार्य ने सभा को संबोधित करते हुए आयुर्वेद ज्ञान के संरक्षण, प्रलेखन और प्रसार के लिए सीसीआरएएस द्वारा की गई विभिन्न पहलों पर प्रकाश डाला। उन्होंने देश की समृद्ध ज्ञान परंपराओं के संरक्षण और संवर्धन के लिए भारत सरकार द्वारा ज्ञान भारतम मिशन के तहत किए जा रहे प्रयासों पर बल दिया।

पंद्रह दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम आयुर्वेद और संस्कृत पृष्ठभूमि के युवा विद्वानों को विशेषज्ञों के साथ मिलकर अप्रकाशित आयुर्वेद पांडुलिपियों को समझने, लिप्यंतरण करने, संपादित करने और प्रकाशन के लिए तैयार करने में सक्षम बनाएगा। यह सीसीआरएएस और केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित की जा रही तीसरी कार्यशाला है। इससे पहले, ओडिशा के पुरी में करणी/देवनागरी लिपियों पर और केरल के गुरुवायूर में वट्टेझुथु/मलयालम लिपियों पर कार्यशालाएं आयोजित की गई थीं।

कार्यक्रम के दौरान तैयार की गई लिप्यंतरित पांडुलिपियों का उपयोग बाद में सीसीआरएएस और केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशन के लिए किया जाएगा, जिससे भारत के पारंपरिक ज्ञान संसाधनों के संरक्षण और व्यापक प्रसार में योगदान मिलेगा।

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