नयी दिल्ली , जून 12 -- जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ती भूस्खलन, बादल फटने और अचानक बाढ़ जैसी घटनाओं से निपटने के लिए सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने पहाड़ी क्षेत्रों में राष्ट्रीय राजमार्गों पर सैटेलाइट आधारित पूर्व चेतावनी और निगरानी प्रणाली स्थापित करने का निर्णय लिया है।

मंत्रालय के अनुसार उत्तराखंड के चारधाम मार्ग के 100 किलोमीटर हिस्से पर इनसार (इंटरफेरोमेट्रिक सिंथेटिक एपर्चर रडार) तकनीक आधारित भूस्खलन निगरानी प्रणाली का परीक्षण किया जा रहा है। यह तकनीक भू-सतह में होने वाली सूक्ष्म हलचलों का पहले ही पता लगा सकेगी, जिससे संभावित खतरे वाले क्षेत्रों की पहचान कर समय रहते एहतियाती कदम उठाए जा सकेंगे। हिमाचल प्रदेश के राष्ट्रीय राजमार्ग-5 के परवानू-सोलन खंड पर भी इसी तरह की चेतावनी प्रणाली विकसित की जा रही है।

हिमालयी क्षेत्रों में सड़क निर्माण की बढ़ती चुनौतियों को देखते हुए मंत्रालय अब परियोजनाओं में वैज्ञानिक जोखिम मूल्यांकन को अनिवार्य बना रहा है। ड्रोन, लिडार सर्वेक्षण, डिजिटल टेरेन मॉडल और भूवैज्ञानिक मानचित्रों की मदद से ढलानों की जांच की जाएगी तथा आवश्यकतानुसार रॉक एंकर, स्टील वायर जाल, रिटेनिंग दीवार और उन्नत जल निकासी व्यवस्था जैसे उपाय अपनाए जाएंगे।

मंत्रालय ने पहाड़ी क्षेत्रों के लिए चरणबद्ध निर्माण पद्धति भी अपनाई है, जिसके तहत शुरुआती अवधि ढलानों की कटाई और स्थिरीकरण कार्यों के लिए निर्धारित होगी और सड़क निर्माण तभी शुरू किया जाएगा, जब ढलान कम से कम एक मानसून के दौरान स्थिर साबित हो जाएं। इसके साथ ही हिमालय, पूर्वोत्तर, पश्चिमी घाट और अंडमान-निकोबार जैसे संवेदनशील क्षेत्रों की परियोजनाओं के लिए अतिरिक्त निर्माण अवधि और ढलान संरक्षण के लिए अधिक भूमि का प्रावधान किया गया है।

सरकार का कहना है कि पर्वतीय क्षेत्रों में राष्ट्रीय राजमार्ग निर्माण की लागत 15 से 30 करोड़ रुपये प्रति किलोमीटर तक आती है, जबकि एक मध्यम भूस्खलन से 10 से 25 करोड़ रुपये तक की मरम्मत लागत और दो से पांच दिन तक यातायात बाधित होने की स्थिति पैदा हो सकती है। ऐसे में उपग्रह आधारित निगरानी और समय रहते किए जाने वाले शमन उपायों से नुकसान और रखरखाव लागत कम करने में मदद मिलेगी।

मंत्रालय ने बताया कि उत्तराखंड में भूस्खलन प्रभावित 58 स्थलों पर सुरक्षा कार्य पूरे किए जा चुके हैं, 96 स्थानों पर काम चल रहा है और 104 अन्य स्थलों के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार की जा रही है। मंत्रालय का मानना है कि इन उपायों से पहाड़ी राज्यों में राजमार्गों की सुरक्षा बढ़ेगी और प्राकृतिक आपदाओं के कारण यातायात बाधित होने की घटनाओं में कमी आएगी।

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