तिरुवनंतपुरम , जनवरी 21 -- मौजूदा दौर के कुछ सबसे प्रभावशाली साइबर अभियानों का स्वरूप किसी हमले जैसा नहीं होता। वे न तो तत्काल कोई व्यवधान पैदा करते हैं, न कोई अलार्म सक्रिय होता है और न ही वे वर्षों तक दिखाई देते हैं।

इनकी रणनीतिक अहमियत इस बात में नहीं होती कि वे उस समय क्या करते हैं, बल्कि इसमें होती है कि वे चुपचाप आगे क्या संभव बना देते हैं। सुरक्षा विश्लेषकों का कहना है कि आधुनिक साइबर संघर्ष अब सामने आने से बहुत पहले ही तैयार कर लिया जाता है।

इंटेलिग्रिड से जुड़े साइबर-फिजिकल सिस्टम्स सुरक्षा विशेषज्ञ के. एस. मनोज ने कहा, " यह वास्तविकता लेबनान के पेजर मामले में स्पष्ट रूप से सामने आयी। ऐसे संचार उपकरण जो देखने में साधारण और तकनीकी रूप से मामूली लगते थे, बाद में समन्वित तरीके से सक्रिय किये गये और बिना किसी रियल-टाइम हैकिंग के संकेत के शारीरिक नुकसान पहुंचाया गया।"इसके बाद आयी अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों से संकेत मिला कि निर्णायक सेंध संभवतः बहुत पहले ही डिवाइस के डिजाइन, निर्माण या वितरण के चरण में लग चुकी थी। विश्लेषकों के लिए यह घटना इस बात का उदाहरण है कि संघर्ष के तौर-तरीकों में बदलाव आ रहा है, जहां आधुनिक हमले सक्रिय किये जाने से काफी पहले ही सिस्टम में छिपे रूप से स्थापित कर दिये जाते हैं।

सुरक्षा विशेषज्ञ इस रणनीति को 'पूर्व-स्थित साइबर अभियान' बताते हैं, जिसका केंद्र किसी सिस्टम, डिवाइस या अवसंरचना में गुप्त रूप से स्थायी या निष्क्रिय पहुंच स्थापित करना होता है, बिना तत्काल सक्रियता के। पारंपरिक साइबर हमलों के विपरीत, जो तुरंत प्रभाव डालने के लिए किए जाते हैं, पूर्व-स्थित अभियानों में लंबे समय तक मौजूदगी, न्यूनतम फॉरेंसिक निशान और केवल रणनीतिक या भू-राजनीतिक परिस्थितियों में सक्रियता पर जोर दियाजाता है।

कई मामलों में इस तरह की पहुंच का कभी इस्तेमाल ही नहीं होता। इसकी उपयोगिता क्रियान्वयन में नहीं, बल्कि विकल्प के रूप में होती है। लेबनान पेजर मामला इसलिए भी अहम है, क्योंकि यह दिखाता है कि साइबर ऑपरेशन अब केवल डिजिटल नेटवर्क तक सीमित नहीं हैं, बल्कि आपूर्ति शृंखलाओं और भौतिक वस्तुओं तक फैल चुके हैं।

डिवाइस के उपयोग में आने से पहले ही ऊपर के स्तर पर सिस्टम से समझौता कर लेने से हमलावर पारंपरिक साइबर सुरक्षा उपायों को पूरी तरह दरकिनार कर सकते हैं। विश्लेषकों का कहना है कि इसका अर्थ यह है कि सिस्टम का ऑनलाइन होना भी जोखिम की अनिवार्य शर्त नहीं रह गया है, साइबर कार्रवाई और भौतिक प्रभावों के बीच लंबे समय का अंतर हो सकता है, और निर्माण एवं खरीद प्रक्रियाओं में भरोसा अब एक गंभीर कमजोर कड़ी बन चुका है।

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