बीजापुर, मार्च 06 -- छत्तीसगढ में सर्व आदिवासी समाज के पदाधिकारियों ने आदिवासी विकासखंडों के मुख्य कार्यपालन अधिकारियों (सीईओ) का प्रशासनिक नियंत्रण आदिम जाति तथा अनुसूचित जाति विकास विभाग से हटाकर पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग को हस्तांतरित किए जाने के प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया है। समाज के प्रतिनिधिमंडल ने जिला कलेक्टर के माध्यम से मुख्यमंत्री के नाम एक ज्ञापान सौंपकर इस फैसले को तुरंत वापस लेने की मांग की है।
समाज के पदाधिकारियों ने आज (शुक्रवार) बताया कि सामान्य प्रशासन विभाग नवा रायपुर के पत्र दिनांक 27 फरवरी के तहत यह विवादास्पद प्रस्ताव तैयार किया गया है। उनका कहना है कि यह कदम संविधान की पांचवीं अनुसूची के तहत अनुसूचित क्षेत्रों के लिए बने विशेष प्रावधानों के खिलाफ है। आदिम जाति विकास विभाग विशेष रूप से आदिवासी समुदाय के कल्याण और संरक्षण के लिए गठित किया गया था। प्रशासनिक नियंत्रण बदलने से इस विभाग की प्रभावशीलता कम हो जाएगी और आदिवासी क्षेत्रों के विकास की मुख्यधारा कमजोर पड़ जाएगी।
ज्ञापन में कहा गया है कि आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में पेसा कानून लागू है, जहां ग्राम सभाओं को विशेष अधिकार प्राप्त हैं। इन क्षेत्रों के विकासखंडों के सीईओ का आदिम जाति विकास विभाग के अधीन होना ग्राम सभाओं के सशक्तिकरण और योजनाओं के बेहतर समन्वय के लिए आवश्यक है। यदि नियंत्रण पंचायत विभाग को हस्तांतरित कर दिया गया तो योजनाओं के क्रियान्वयन में जटिलताएं उत्पन्न होंगी और आदिवासी क्षेत्रों के विकास कार्य प्रभावित होंगे। साथ ही, ट्राइबल सब प्लान की योजनाओं पर भी प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका जताई गई है।
सर्व आदिवासी समाज बीजापुर ने मांग की है कि आदिवासी विकासखंडों के सीईओ के प्रशासनिक नियंत्रण को किसी भी स्थिति में अन्य विभाग को न हस्तांतरित किया जाए और इसे पूर्व की भांति आदिम जाति तथा अनुसूचित जाति विकास विभाग के अधीन ही रखा जाए। समाज ने यह भी चेतावनी दी कि यदि इस मांग पर सकारात्मक निर्णय नहीं लिया गया तो पूरे राज्य में चरणबद्ध आंदोलन छेड़ दिया जाएगा।
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