झाबुआ , सितंबर 11 -- मध्यप्रदेश के आदिवासी क्षेत्रों में फसल पकने के उत्सव के रूप में नवई पर्व पारंपरिक तरीके से मनाया जाता है। इस अवसर पर खेतों में तैयार हुई नई फसल को सबसे पहले स्थानीय देवी-देवताओं और पूर्वजों को अर्पित किया जाता है। इसके बाद ही नई फसल का भोजन में उपयोग शुरू किया जाता है।
नवई पर्व में ककड़ी, भुट्टा, मक्का, चवला, मूंग, ज्वार सहित अन्य नई फसलों को देवस्थल पर ले जाकर पूजा-अर्चना की जाती है और उनका भोग देवी-देवताओं तथा पूर्वजों को लगाया जाता है। इसके बाद परिवार के लोग नई फसल का सेवन करते हैं। परंपरा के अनुसार पहली फसल से सेठ-साहूकारों को भी फसल खाने के लिए दी जाती है।
आदिवासी गांवों में नवई पर्व की तिथि पूरे गांव के पटेल, पुजारा और तड़वी की सहमति से तय की जाती है। अलग-अलग गांवों में स्थानीय परंपरा के अनुसार पर्व की तिथि निर्धारित होती है। इस दौरान घरों की साफ-सफाई, पूजा-अर्चना, लोकगीत और सामूहिक नृत्य-गायन किया जाता है। कुछ क्षेत्रों में रात में पारंपरिक गायणा भी गाया जाता है, जिसमें प्रकृति, ग्राम देवता, कुलदेवता और पूर्वजों का स्मरण किया जाता है।
बारिश के मौसम के बाद जब खेतों में मक्का, ज्वार, मूंग, चवला और ककड़ी जैसी फसलें तैयार होने लगती हैं, तब गांवों में नवई पर्व की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। निश्चित दिन परिवार के सदस्य खेत से नई फसल लेकर आते हैं और उसे देवस्थल पर ले जाकर पूजा करते हैं।
नई फसल को देवी-देवताओं और पूर्वजों को अर्पित करने की इस परंपरा में धरती, पानी, वर्षा, सूर्य और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का भाव भी जुड़ा हुआ है। पर्व सामूहिक रूप से गांव की एकता और पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था के साथ मनाया जाता है।
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