महोबा-, अक्टूबर 12 -- उत्तर प्रदेश मे बुंदेलखंड के ग्रामीण अंचल में महिलाएं अब आत्मनिर्भरता की नई कहानियां लिख रही हैं। महोबा जिले के चरखारी क्षेत्र के रिबई गांव की रमा तिवारी ऐसी ही एक प्रेरणादायक महिला हैं, जिन्होंने आर्थिक तंगी से जूझते हुए न केवल अपनी जिंदगी बदली, बल्कि स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से करीब 200 महिलाओं को रोजगार और आत्मनिर्भरता की राह दिखाई। लगभग तीन हजार क़ी आबादी वाले गाँव रिवई क़ी रमा तिवारी के पति प्रमोद तिवारी अहमदाबाद में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करते हैं। उन्हें प्रतिमाह 15 हजार रुपये वेतन मिलता है। दूसरे शहर में रहने और नौकरी से जुड़े खर्चों के बाद परिवार के पास घर भेजने के लिए महज 6 से 7 हजार रुपये ही बचते थे। बच्चों की पढ़ाई और घरेलू जरूरतों में यह रकम खर्च हो जाती थी, जिससे बचत करना मुश्किल था।

इसी बीच किरण द्विवेदी नामक महिला से सम्पर्क मे आने पर रमा तिवारी नरसिंह प्रेरणा समूह से जुड़ीं। इसके बाद उन्हें समूह सखी की जिम्मेदारी मिली। उन्होंने अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए स्वरोजगार का रास्ता चुना और 60 हजार रुपये का कर्ज लेकर मसाला पिसाई मशीन स्थापित की। धीरे-धीरे उनका कारोबार आगे बढ़ने लगा।

रमा ने अपने व्यवसाय में दूसरी महिलाओं को भी भागीदार बनाया। उन्होंने समूह की महिलाओं को मसालों की पैकेजिंग के काम से जोड़ा। इससे महिलाओं को गांव में ही रोजगार मिलने लगा। रमा स्वयं प्रतिमाह लगभग 10 हजार रुपये कमाने लगीं और काम करने वाली महिलाओं को प्रतिदिन 200 रुपये तक मेहनताना देने लगीं।

इस पूरे प्रकरण मे यह महत्वपूर्ण है क़ि रमा तिवारी ने अपनी पहल को केवल व्यक्तिगत कारोबार तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने पंचायत क्षेत्र में ब्रह्मदेव, पलक प्रेरणा, हरिनारायण, शीतला माता और ब्रह्मचारिणी सहित कुल 25 स्वयं सहायता समूहों के गठन में भूमिका निभाई। इन समूहों के माध्यम से महिलाओं को बकरी पालन, भैंस पालन, मुर्गी पालन और अन्य स्वरोजगार गतिविधियों से जुड़ने के अवसर मिले।

इन प्रयासों से लगभग 200 महिलाएं आर्थिक रूप से मजबूत बनने की दिशा में आगे बढ़ीं। अब वे अपने परिवार की आमदनी बढ़ाने में योगदान दे रही हैं और जरूरतों के लिए दूसरों पर निर्भरता कम कर रही हैं।रमा तिवारी की यह पहल ग्रामीण महिलाओं के लिए प्रेरणा बन रही है। उनकी कहानी बताती है कि सही मार्गदर्शन, समूह की ताकत और स्वरोजगार के अवसर मिलें तो सीमित संसाधनों के बीच भी महिलाएं अपने परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने के साथ समाज में बदलाव की वाहक बन सकती हैं।

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