चेन्नई , अक्टूबर 23 -- शोधकर्ताओं ने एक बहुराष्ट्रीय अध्ययन में यह पता लगाया है कि आणविक गति नैनोस्केल इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को नियंत्रित करने में मदद कर सकती है।

इस शोध में आईआईटी-मद्रास के एक संकाय सदस्य भी शामिल थे।

अंतरराष्ट्रीय शोध दल ने भौतिकी, रसायन विज्ञान और नैनो तकनीक के मिलन बिंदु पर मौलिक अनुसंधान में एक बड़ी सफलता प्राप्त की है। उन्होंने इस बात पर ध्यान केंद्रित किया है कि आणविक गति और विद्युत परिवहन एक-दूसरे को किस प्रकार प्रभावित करते हैं। इससे शोधकर्ताओं को ऐसे नैनोस्केल घटक विकसित करने में मदद मिल सकती है जिनके विद्युत व्यवहार को आणविक गति के माध्यम से नियंत्रित किया जा सके।

वैज्ञानिक नैनोप्रौद्योगिकी और आणविक इलेक्ट्रॉनिक्स में संभावित उपयोग के लिए आणविक मशीनों का अध्ययन कर रहे हैं। यह अध्ययन दर्शाता है कि किस तरह विद्युत धारा आणविक गति को प्रेरित कर सकती है और कैसे आणविक घूर्णन परमाण्विक पर विद्युत चालन को बढ़ा सकता है। इससे आणविक मशीनों और भविष्य की नैनोस्केल तकनीकों में उनकी संभावित भूमिका के बारे में समझ बेहतर होती है।

शोधकर्ताओं ने एक ऐसी प्रक्रिया का प्रदर्शन किया जिसमें परमाण्विक स्तर पर आणविक गति और विद्युत चालन एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। उन्होंने एक ऐसी आणविक मशीन प्रदर्शित की जिसमें विद्युत धारा एक अकेले अणु को एक निश्चित दिशा में घूमने के लिए प्रेरित करती है और यह घूर्णन, बदले में, उस अणु से होकर गुजरने वाली विद्युत धारा को बढ़ा सकता है।

इस शोध दल में पांच देशों भारत, इज़रायल, जर्मनी, डेनमार्क और चीन के शोधकर्ता शामिल थे। आणविक मशीनें ऐसी संरचनाएं होती हैं जो प्रकाश, रसायनों या विद्युत जैसे उद्दीपनों के जवाब में विशिष्ट कार्य करती हैं। जैविक प्रणालियां कोशिका के ज़रूरी कार्यों को करने के लिए आणविक मशीनों का उपयोग करती हैं। वैज्ञानिक नैनोप्रौद्योगिकी और आणविक इलेक्ट्रॉनिक्स में इनके संभावित उपयोगों के लिए मॉलिक्यूलर मशीनों का अध्ययन कर रहे हैं। एक बड़ी चुनौती यह समझने की रही है कि विद्युत धारा किस प्रकार नियंत्रित आणविक गति को प्रेरित कर सकती है और यह गति किस तरह बदले में विद्युत धारा को परिवर्तित कर देती है।

यह अध्ययन दर्शाता है कि किस तरह विद्युत धारा आणविक गति को प्रेरित कर सकती है और कैसे आणविक घूर्णन परमाण्विक पर विद्युत चालन को बढ़ा सकता है। इससे आणविक मशीनों और भविष्य की नैनोस्केल तकनीकों में उनकी संभावित भूमिका के बारे में हमारी समझ बेहतर होती है।

यह अध्ययन 'नेचर' में प्रकाशित हुआ है, जो एक अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका है और इसे दुनिया की प्रमुख शोध पत्रिकाओं में से एक माना जाता है। आईआईटी मद्रास के डॉ. अनिल कुमार सिंह इस अध्ययन के 'करस्पॉन्डिंग ऑथर' हैं और उन्होंने ही इसमें मुख्य प्रयोगात्मक योगदान दिया है।

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