पटना , अप्रैल 15 -- सम्राट चौधरी ने बिहार के 24वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले ली है और इसके साथ ही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अपनी उंस महत्वाकांक्षा को हासिल कर लिया है, जिसका पीछा वह लंबे समय से कर रही थी।

भाजपा ने 2023 में सम्राट चौधरी को पार्टी का बिहार प्रदेश अध्यक्ष बना कर जो राजनीतिक निवेश किया था, तीन साल बाद उसकी ब्याज के साथ वसूली हो गयी है। 46 साल पुरानी इस पार्टी को लंबे जद्दोजहद के बाद बिहार में उसका पहला मुख्यमंत्री मिल गया है।

बिहार में नीतीश कुमार जब 26 साल पहले महज सात दिनों के लिए मुख्यमंत्री बने थे, तब सम्राट चौधरी विरोधी राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के टिकट पर परबत्ता विधानसभा क्षेत्र से चुन कर आये थे। इस चुनाव में श्री चौधरी के पिता और नीतीश कुमार की पुरानी समता पार्टी के संस्थापक सदस्यों में एक शकुनी चौधरी भी विरोधी खेमे में थे। सन 2000 के चुनाव में नीतीश की पार्टी को सिर्फ 34 सीटें मिली थी, जबकि भाजपा ने 67 सीटें जीती थीं। बावजूद इसके प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपनी ही कैबिनेट में शामिल गठबंधन के एक घटक दल के नेता नीतीश कुमार को प्रदेश की राजनीति में मुख्यमंत्री के दावेदार के रूप में उतार दिया था। वाजपेयी की यह उदारता गठबंधन के सहयोगी दलों के प्रति उनकी उदारता के रूप में देखी गयी। इस प्रयोग में नीतीश भले सात दिन मुख्यमंत्री रहे, लेकिन बिहारवासियों को भविष्य के लिए मुख्यमंत्री का एक नया चेहरा मिल गया। बाद में नवंबर 2005 में नीतीश मुख्यमंत्री बने और 16 जून 2013 तक भाजपा के सहयोग से इस पद पर बने रहे।

यह वही दौर था जब सम्राट चौधरी राजनीति के विद्यार्थी के रूप में विकसित हो रहे थे। सन 2000 में परबत्ता विधानसभा सीट से पहली बार राष्ट्रीय जनता दल से विधायक बनने के बाद 2005 का विधानसभा चुनाव वह हार गये थे और 2010 में वापसी करते हुए एक बार फिर परबत्ता सीट से जीत कर विधानसभा में पहुंचे। 2014 में श्री चौधरी ने राजद के साथ अपनी लंबी राजनीतिक पारी का पटाक्षेप किया और नीतीश कुमार की जदयू का हिस्सा बन गए। उन्हें उस समय तत्कालीन मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी की कैबिनेट में नगर विकास और आवास मंत्री का पद हासिल हुआ। इससे पहले 1999 में श्री चौधरी राबड़ी देवी के मंत्रिमंडल में भी शामिल हुए थे, लेकिन वह चांदनी थोड़े समय की थी।

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