नयी दिल्ली , मई 28 -- पिछले तीन दशकों से अपनी हैरतअंगेज हवाई करतबबाजी से आकाश में रोमांच बिखरने वाली भारतीय वायु सेना की सूर्य किरण एरोबैटिक टीम ने तीस वर्षों के गौरवमयी सफर में देश और विदेश में 800 से भी अधिक हवाई प्रदर्शन कर अपना परचम लहराया है।
आकाश में अपने लाल और सफेद विमानों को न जानें कितनी मुद्राओं और फॉर्मेशन में दर्शकों को दांतों तले उंगली दबाने के लिए मजबूर करने वाली यह टीम साहस, अनुशासन और सटीकता की पहचान बन चुकी है। टीम के सदस्य हवाई प्रदर्शन के दौरान बेखौफ होकर लूप , बैरल रोल, इनवर्टेड फ्लाइंग और सिग्नेचर 'डायमंड' व 'डीएनए' फॉर्मेशन जैसे खतरनाक करतब दिखाते हैं।
रक्षा मंत्रालय ने बुधवार को बताया कि एयरोबैटिक टीम ने अपनी 30 वीं वर्षगांठ पर गौरवशाली सफर के दौरान अपनी जान गंवाने वाले सदस्यों को मर्मस्पर्शी 'हॉलो डायमंड' फॉर्मेशन बनाकर श्रद्धांजलि दी।
इस अवसर पर वायु सेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल ए पी सिंह और प्रशिक्षण कमान के प्रमुख एयर मार्शल एस श्रीनिवास ने भी टीम के साथ उडान भरी।
वर्ष 1996 में कर्नाटक के बीदर वायु सेना स्टेशन में स्थापना के बाद से यह टीम भारत और अन्य देशों के आकाश में 800 से भी अधिक बार करतबाजी दिखा चुकी है।
सूर्य किरण एरोबैटिक टीम में शुरू में एचएएल एचजेटी-16 किरण एमके.2 प्रशिक्षक विमान शामिल किये गये थे। इस टीम का गठन विंग कमांडर कुलदीप मलिक के नेतृत्व में किया गया था। वह वायु सेना की पहली आधिकारिक फॉर्मेशन एरोबैटिक टीम थंडरबोल्ट के सदस्य थे। एरोबैटिक टीम ने 15 सितंबर 1996 को कोयंबटूर में वायुसेना प्रशासनिक कॉलेज के स्वर्ण जयंती समारोह में अपना पहला सार्वजनिक प्रदर्शन किया।
वर्ष 1998 में विंग कमांडर एके मुर्गाई की कमान में नौ विमानों के साथ इस टीम का विस्तार किया गया। इस टीम ने लाल किले में स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान पहली बार सार्वजनिक रूप से अपने करतब दिखाये। बाद में 8 अक्टूबर 2004 को एरोबैटिक टीम चीफ ऑफ एयर स्टाफ यूनिट प्रशस्ति पत्र से सम्मानित की जाने वाली वायु सेना की पहली इकाई बनी। मई 2006 से, टीम को एक अलग स्क्वाड्रन दिया गया, जो भारतीय वायु सेना का 52वां स्क्वाड्रन बन गया, जिसे शार्क उपनाम दिया गया। एयरो इंडिया 2011 के बाद, सूर्य किरण टीम को 'ग्राउंडेड' कर दिया गया क्योंकि वायु सेना को किरण प्रशिक्षण विमानों की कमी का सामना करना पड़ा था।
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