नयी दिल्ली , अप्रैल 23 -- प्रवर्तन निदेशालय ने बुधवार को संविधान के अनुच्छेद 32 के अंतर्गत अपनी याचिका की वैधता का बचाव करते हुए उच्चतम न्यायालय को पश्चिम बंगाल में कथित रुप से कानून-व्यवस्था के पूरी तरह से चरमरा जाने की जानकारी दी और दावा किया कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के हस्तक्षेप और बाधा के कारण उसके अधिकारी अपने कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ थे।

ईडी ने मुख्यमंत्री और अन्य राज्य पुलिस अधिकारियों के खिलाफ केंद्रीय जांच ब्यूरो से जांच की मांग की है, जो आठ जनवरी को राजनीतिक परामर्श फर्म आई-पैक के सह-संस्थापक प्रतीक जैन के आवास पर हुई घटना के समय उनके साथ थे।

ईडी की ओर से पेश होते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारी की पीठ के समक्ष कहा कि एजेंसी और उसके अधिकारियों को उच्चतम न्यायालय में जाने का अधिकार है क्योंकि उनके मौलिक अधिकारों का हनन हुआ है। उन्होंने तर्क दिया कि "कानून का शासन" समानता के अधिकार (संविधान का अनुच्छेद 14) का हिस्सा है और जब इसका उल्लंघन होता है तो न्यायालय हस्तक्षेप कर सकता है।

लगभग 2,700 करोड़ रुपये की आपराधिक आय से जुड़े कोयला तस्करी मामले का उल्लेख करते हुए श्री मेहता ने कहा कि ईडी के अधिकारियों को वैधानिक कर्तव्यों का निर्वहन करते समय स्वतंत्र रूप से काम करने से रोका गया। उन्होंने कहा कि यह कोई अलग-थलग घटना नहीं है बल्कि केंद्रीय एजेंसियों द्वारा की जा रही जांचों में हस्तक्षेप का एक हिस्सा है।

उन्होंने कहा, "यह मेरी कानूनी दलील है। मैं यह साबित करूंगा कि कानून का उल्लंघन कैसे हुआ है। वहां अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने गए ईडी अधिकारी अपने मौलिक अधिकारों की सुरक्षा की मांग कर रहे हैं।"श्री मेहता ने तर्क दिया कि ऐसी परिस्थितियों में किसी अधिकारी की आधिकारिक एवं व्यक्तिगत क्षमता के बीच अंतर नहीं किया जा सकता क्योंकि बाधा डालने के परिणाम आधिकारिक कर्तव्यों का निर्वहन करने वालों को व्यक्तिगत रूप से भुगतने पड़ते हैं। उन्होंने आगे कहा कि पश्चिम बंगाल सहित राज्य सरकारों ने भी अतीत में अनुच्छेद 32 के तहत शीर्ष अदालत का रुख किया है और अब ईडी के मामले में इसकी वैधता पर सवाल नहीं उठा सकतीं।

ईडी ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर कोलकाता स्थित राजनीतिक परामर्श फर्म आई-पैक के सह-संस्थापक प्रतीक जैन के परिसर में इस वर्ष आठ जनवरी को चलाए गए तलाशी अभियान में हस्तक्षेप करने का आरोप लगाया है और घटना की सीबीआई जांच की मांग की है।

सुनवाई के दौरान, पीठ ने अनुच्छेद 32 के अंतर्गत ऐसी याचिकाओं पर विचार करने को लेकर चिंता व्यक्त की और इसके व्यापक प्रभावों का उल्लेख किया। पीठ ने पूछा, "अगर हम ऐसी याचिकाओं पर विचार करते रहे तो इसमें अंतर्निहित खतरा है। यह न्यायालय अनुच्छेद 32 के तहत दायर याचिकाओं से भर जाएगा। ये याचिकाएं व्यक्तियों द्वारा नहीं बल्कि विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा दायर की जाएंगी। एक न्यायालय के रूप में, क्या हमें इसे हतोत्साहित करना चाहिए या प्रोत्साहित करना चाहिए?"श्री मेहता ने जवाब दिया कि इस तरह की याचिकाओं को आम तौर पर हतोत्साहित किया जाना चाहिए लेकिन उन्होंने कहा कि वर्तमान में मामला अलग है क्योंकि इसमें ऐसे व्यक्ति शामिल हैं जिनके अधिकारों पर कथित तौर पर असर पड़ा है। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों का फैसला तथ्यों के आधार पर किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि इस मामले की जांच तथ्यों के आधार पर होनी चाहिए। उन्होंने बताया कि ईडी के अधिकारियों को अपने कर्तव्यों का पालन करते समय आपराधिक कार्यवाही एवं बाधाओं का सामना करना पड़ा और स्थानीय पुलिस से संपर्क करने से निष्पक्ष जांच सुनिश्चित नहीं होगी।

मामले की सुनवाई 13 मई, 2026 को जारी रहेगी।

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