नयी दिल्ली , अक्टूबर 17 -- सरकार ने आईडीबीआई बैंक के कारोबार का नियंत्रण एक चयनित भागीदार को सौंपने के फैसले को लेकर शनिवार को स्पष्ट किया कि इस वित्तीय संस्थान में सरकार की हिस्सेदारी से संबंधित संसद की पिछली बहसों से इसके रणनीतिक पुनर्गठन के सरकार के अधिकार पर कोई अंकुश नहीं लगता।

वित्त मंत्रालय ने एक बयान में स्पष्ट किया कि न्यायालय में भी इस मुद्दे पर पहले विचार हो चुका है और न्यायालय की व्यवस्था है कि संसद में किसी विधेयक पर बहस के दौरान कुछ भी कहा गया हो पर यदि वह उसके द्वारा पारित अधिनियम में शामिल नहीं की गयी हो तो वह उस कानून का हिस्सा नहीं हो सकती। मंत्रालय ने मीडिया के कुछ हलकों में प्रकाशित प्रसारित खबरों के संदर्भ में यह स्पष्टीकरण जारी किया है।

मंत्रालय ने स्पष्टीकरण में कहा है , ' आईडीबीआई (निरसन) अधिनियम, 2003 का विधायी इतिहास, दिल्ली उच्च न्यायालय का न्यायिक निर्णय और लगातार प्रस्तुत किए गए केंद्रीय बजट भाषण सामूहिक रूप से आईडीबीआई बैंक के रणनीतिक विनिवेश के संबंध में सरकार की नीति के विकास को दर्शाते हैं।"मंत्रालय ने कहा है कि न्यायालय का 17 दिसंबर, 2018 का निर्णय स्पष्ट करता है कि संसदीय बहसों के दौरान दिए गए वक्तव्यों के आधार पर वचनबद्धता विबंधन (प्रॉमिसरी एस्टॉपल) के सिद्धांत का सहारा लेकर आईडीबीआई बैंक लिमिटेड में अपनी हिस्सेदारी कम करने की सरकार की शक्ति को सीमित नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने आगे यह भी कहा कि अधिनियमित कानून में आईडीबीआई बैंक लिमिटेड में सरकार की हिस्सेदारी कम करने पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया गया था।

मीडिया की रिपोर्टों में आईडीबीआई में सरकार की हिस्सेदारी से संबंधित वर्ष 2003 के विधायी घटनाक्रमों पर टिप्पणियाँ और विचारों का उल्लेख किया गया है। मंत्रालय ने इस पर कहा है कि केंद्रीय बजट, 2003 पर चर्चा तथा आईडीबीआई (निरसन) अधिनियम, 2003 पर संसदीय बहस के दौरान सरकार की हिस्सेदारी में कमी को सीमित करने के उद्देश्य से एक संशोधन प्रस्तुत किया गया था, लेकिन अंततः उसे अस्वीकार कर दिया गया और वह अधिनियमित कानून का हिस्सा नहीं बना।

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