विशाखपत्तनम , फरवरी 17 -- राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु बुधवार को 'इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू ( आईएफआर)-मिलन 2026' के तहत 71 युद्धपोतों के विशाल बेड़े का निरीक्षण करेंगी।
यह आयोजन अब तक आयोजित सबसे बड़े समुद्री सम्मेलनों में से एक माना जा रहा है।
नौसेना प्रवक्ता के अनुसार, राष्ट्रपति 'रिव्यू एंकरिज एरिया' में औपचारिक स्तंभ की अगुवाई करते हुए स्वदेश में निर्मित नौसेना के अपतटीय गश्ती पोत आईएनएस सुमेधा पर सवार होंगी, जो इस अवसर पर 'प्रेसिडेंशियल यॉट' की भूमिका निभाएगा। छह स्तंभों में सुसज्जित इस बेड़े में भारतीय नौसेना के 45 पोत, 19 मित्र देशों के युद्धपोत, भारतीय तटरक्षक बल के जहाज, वाणिज्यिक और अनुसंधान पोत शामिल होंगे। इसके साथ ही लगभग 50 विमानों की फ्लाई-पास्ट और हवाई संरचनाएं भी आकर्षण का केंद्र रहेंगी।प्रदर्शनी का मुख्य आकर्षण भारत का स्वदेशी विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत होगा, जो देश की बढ़ती समुद्री क्षमता और रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता को दर्शाता है।
उन्होंने बताया कि सशस्त्र बलों की सर्वोच्च कमांडर के रूप में राष्ट्रपति समुद्र में सुव्यवस्थित पंक्तियों में खड़े जहाजों का निरीक्षण करेंगी। यह परंपरागत नौसैनिक आयोजन परिचालन तत्परता, अनुशासन और समुद्री शक्ति का प्रतीक माना जाता है।
समीक्षा के दौरान राष्ट्रपति नौसेना के विमानों की हवाई कलाबाजियां, मरीन कमांडो के उच्च-तीव्रता सामरिक प्रदर्शन, हेलीकॉप्टर खोज एवं बचाव अभियान और अग्रिम पंक्ति के युद्धपोतों व पनडुब्बियों की 'स्टीम पास्ट' परेड देखेंगी। इसके अलावा नौसेना की विविध परिचालन क्षमताओं को दर्शाने वाली नौकाओं की औपचारिक परेड भी आयोजित की जाएगी।
'आईएफआर-मिलन 2026' के अंतर्गत 19 फरवरी को एक अंतरराष्ट्रीय सिटी परेड भी आयोजित होगी, जिसमें सैन्य एवं सांस्कृतिक टुकड़ियां, अंतरराष्ट्रीय नौसैनिक बैंड, ड्रोन शो, लेजर शो और आतिशबाजी शामिल रहेंगे।
वर्ष 1995 में शुरू हुआ 'मिलन' अभ्यास अब एक प्रमुख बहुपक्षीय समुद्री मंच बन चुका है, जिसमें 65 से अधिक नौसेनाओं की भागीदारी रही है। इस वर्ष थाईलैंड, ऑस्ट्रेलिया, श्रीलंका, इंडोनेशिया, संयुक्त अरब अमीरात और बांग्लादेश सहित एशिया, मध्य-पूर्व, अफ्रीका और यूरोप के देशों के पोत विशाखापत्तनम पहुंचे हैं।
कार्यक्रम के दौरान रक्षा संवाद और उच्चस्तरीय समुद्री सेमिनार भी आयोजित किए जाएंगे।
प्रवक्ता के अनुसार, यह आयोजन हिंद-प्रशांत क्षेत्र में नियम-आधारित स्थिर व्यवस्था को बढ़ावा देने और 'सागर' (क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास) तथा 'एक्ट ईस्ट' नीति के अनुरूप भारत की विश्वसनीय समुद्री शक्ति की भूमिका को मजबूत करने की प्रतिबद्धता दर्शाता है।
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