मस्कट/नयी दिल्ली , जनवरी 14 -- भारत और ओमान के बीच 5,000 साल पुराने समुद्री और सांस्कृतिक संबंधों को जीवंत करते हुए भारतीय नौसेना का विशेष पाल पोत 'आईएनएसवी कौंडिन्य' बुधवार को ओमान के सुल्तान कबूस बंदरगाह पहुंच गया।
पांचवीं शताब्दी की प्राचीन तकनीक से निर्मित इस जहाज ने गुजरात के पोरबंदर से अपनी 1,400 किलोमीटर की ऐतिहासिक पहली अंतरराष्ट्रीय यात्रा सफलतापूर्वक पूरी की।
यह पोत पोरबंदर से 29 दिसंबर को रवाना हुआ था। इसके चालक दल का मस्कट पहुंचने पर भव्य स्वागत किया गया।
भारत के केंद्रीय बंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने बंदरगाह पर यात्रियों की अगवानी की। इस अवसर पर ओमान के विरासत एवं पर्यटन मंत्रालय के अवरसचिव अज़ान अल बुसैदी सहित भारतीय नौसेना, ओमान शाही नौसेना और ओमान शाही पुलिस तटरक्षक बल के वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद थे। मस्कट में जहाज का स्वागत 'वॉटर सैल्यूट' के साथ किया गया। इस दौरान भारत एवं ओमान के पारंपरिक सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रस्तुति दी गयी।
यह अभियान विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों देश अपने राजनयिक संबंधों की स्थापना की 70वीं वर्षगांठ मना रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की परिकल्पना पर आधारित इस परियोजना को भारतीय नौसेना ने पुरातत्वविदों और पारंपरिक जहाज निर्माताओं के सहयोग से साकार किया है।
आईएनएसवी कौंडिन्य पांचवीं शताब्दी ईस्वी के उस जहाज पर आधारित है जिसे अजंता की गुफाओं के चित्रों में दर्शाया गया है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसकी 'स्टिच्ड-प्लैंक' निर्माण विधि है। इसमें लकड़ी के तख्तों को बिना किसी कील के केवल नारियल के रेशों और प्राकृतिक चीजों से बांधा गया है। केरल के कुशल कारीगरों ने बाबू शंकरन के नेतृत्व में इस लुप्तप्राय परंपरा को पुनर्जीवित किया है। फरवरी 2025 में गोवा में जलावतरण के बाद मई 2025 में इसे आधिकारिक रूप से नौसेना में शामिल किया गया था।
इस परियोजना में भारतीय नौसेना ने केंद्रीय भूमिका निभाई। डिज़ाइन और तकनीकी सत्यापन से लेकर निर्माण प्रक्रिया की निगरानी तक का काम नौसेना ने किया। ऐसे प्राचीन जहाज़ों के कोई ब्लूप्रिंट उपलब्ध न होने के कारण इसका निर्माण मूर्तिकला और चित्रात्मक स्रोतों के आधार पर करना पड़ा।
इस जहाज का नाम पहली सदी के महान भारतीय नाविक कौंडिन्य के नाम पर रखा गया है, जो हिंद महासागर पार कर मेकांग डेल्टा तक गए थे। भारतीय नौसेना के पालपोत के रूप में शामिल किए जाने के बाद कौंडिन्य को 29 दिसंबर को गुजरात से ओमान रवाना किया गया था। इस पोत में कई सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण विशेषताएं सम्मिलित हैं।
यह पोत भारत की दीर्घकालीन समुद्री अन्वेषण, व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान की परंपराओं का सजीव प्रतीक है।
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