नयी दिल्ली , जून 29 -- विज्ञान और प्रौद्याेगिकी विभाग (डीएसटी) के स्वायत्त संस्थान, नैनो साइंस एवं तकनीकी संस्थान (आईएनएसटी) के वैज्ञानिकों ने एक इलेक्ट्रोलाइट एडिटिव विकसित किया है। यह जिंक धातु की सतहों पर चुनिंदा रूप से चिपकता है और जलीय जिंक-आयन बैटरी (एजेडआईबी) के 'भीतरी तल' को नियंत्रित करता है,जहां विशेष रूप से अधिशोषित आयन और विलायक के अणु इलैक्ट्रोड के सबसे करीब होते हैं।
यह इलेक्ट्रोलाइट एडिटिव, सुरक्षित, लंबे समय तक चलने वाली और अधिक किफायती रिचार्जेबल जिंक बैटरी बनाने में मदद कर सकता है। जलीय जिंक-आयन बैटरी (एजेडआई) लिथियम-आयन बैटरी के कम लागत वाले, सुरक्षित और टिकाऊ विकल्प के रूप में उभर रही हैं। हालाँकि, जिंक डेंड्राइट वृद्वि , हाइड्रोजन गैस उत्पत्ति अभिक्रिया , जंग और खराब चक्रण स्थिरता के कारण इनके बड़े पैमाने पर निर्माण में रुकावट आती है। यह शाेध महंगे सामग्री को फिर से डिज़ाइन करने के बजाय इंटरफ़ेस इंजीनियरिंग के ज़रिए इन अहम चुनौतियों का समाधान करती है। यह काम सुरक्षा और कम लागत बनाए रखते हुए बैटरी की उम्र बढ़ाने के लिए एक व्यावहारिक और बड़े पैमाने पर लागू करने योग्य रणनीति प्रदान करता है, जो बड़े पैमाने पर नवीकरणीय ऊर्जा भंडारण अनुप्रयोग के लिए ज़रूरी है।
शोधकर्ता जिंक एनोड की स्थिरता को बढ़ाने के तरीकों पर काम कर रहे हैं और इसके साथ ही इलेक्ट्रिक दोहरी परत के महत्व और 'इनर हेल्महोल्ट्ज़ प्लेन' की भूमिका पर भी ध्यान दे रहे हैं, जहाँ असल में इलेक्ट्रोकेमिकल क्रियाएं होती हैं। उन्होंने सोडियम हाइड्रॉक्साइड और पानी में ग्लूटामिक एसिड को घोला, और फिर उसमें ग्लाइऑक्सल, फॉर्मेल्डिहाइड और एसिटिक एसिड मिलाया। इस मिश्रण को नाइट्रोजन के माहौल में 70 डिग्री तापमान पर 24 घंटे तक गर्म किया गया और फिर बीडीआईएम का क्रिस्टलाइन पाउडर पाने के लिए इसके खास हिस्से को अलग कर बहुत कम तापमान पर ठंडा किया गया।
बीडीआईएम एडिटिव में कई ऑक्सीजन और नाइट्रोजन डोनर साइट्स होती हैं जो जिंक धातु के साथ मज़बूती से क्रिया करती हैं। बैटरी के काम करने के दौरान, बीडीआईएम मुख्य रूप से नेगेटिव चार्ज वाली जिंक की सतह पर चिपक जाता है और 'इनर हेल्महोल्ट्ज़ प्लेन' पर अपनी जगह बना लेता है। यह सोखने की प्रक्रिया इंटरफ़ेस से पानी के अणुओं को हटा देती है, जिससे पानी की वजह से होने वाली साइड रिएक्शन (जैसे हाइड्रोजन निकलना और जंग लगना) कम हो जाती हैं और हाइड्रोजन निकलना, जंग लगना और डेंड्राइट बनना रुक जाता है।
आईएनएसटी मोहाली के साइंटिस्ट (ई) डॉ. रामेंद्र सुंदर डे के नेतृत्व में हुआ और एसीएस इलेक्ट्रोकेमिस्ट्री जर्नल में प्रकाशित यह शाेध प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से एजेडआईबी, ग्रिड-स्केल एनर्जी स्टोरेज सिस्टम, नवीकरणीय ऊर्जा भंडारण और बैटरी की सुरक्षा और अवधि काल को बढ़ाने वाली तकनीक में लागू किया जा सकता है।
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