रुड़की , मई 15 -- उत्तराखंड के रुड़की स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) के शोधकर्ताओं ने भारतीय उप महाद्वीप के लिए "इंड्रा-सीएमआईपी6" नामक एक उच्च-रेज़ोल्यूशन ओपन-एक्सेस जलवायु प्रक्षेपण डेटासेट जारी किया है। जो ऐतिहासिक तथा भविष्य की जलवायु परिस्थितियों के अंतर्गत लगभग 10 किलोमीटर स्थानिक रेज़ोल्यूशन पर दैनिक बारिश और तापमान प्रक्षेपण प्रदान करता है।

आईआईटी के निदेशक प्रोफेसर कमल किशोर पंत ने शुक्रवार को बताया कि स्थानीय स्तर पर जलवायु अनुकूलन और जोखिम आकलन को समर्थन देने के उद्देश्य से विकसित यह डेटासेट वैश्विक जलवायु मॉडलों की एक प्रमुख सीमा को दूर करता है, क्योंकि उनकी कम रेज़ोल्यूशन देश की जटिल भौगोलिक संरचना, मानसूनी परिवर्तनशीलता और क्षेत्रीय जलवायु चरम स्थितियों को प्रभावी ढंग से प्रदर्शित नहीं कर पाती।

प्रो. पंत ने बताया कि आईआईटी रुड़की के जल विज्ञान विभाग में विकसित और "साइंटिफिक डेटा" (नेचर पोर्टफोलियो) में प्रकाशित "इंड्रा-सीएमआईपी6" डेटासेट 14 सीएमआईपी6 वैश्विक जलवायु मॉडलों के आउटपुट को "डबल बायस-करेक्टेड कंस्ट्रक्टेड एनालॉग (डीबीसीसीए)" विधि का उपयोग कर डाउनस्केल करता है। उन्होंने बताया कि यह सांख्यिकीय डाउनस्केलिंग पद्धति दैनिक मौसम परिवर्तन शीलता, क्षेत्रीय वर्षा पैटर्न और तापमान की चरम स्थितियों के प्रतिनिधित्व में सुधार करती है।

निदेशक पंत ने बताया कि यह डेटासेट 0.1 डिग्री गुणा 0.1 डिग्री रेज़ोल्यूशन पर दैनिक बारिश तथा न्यूनतम और अधिकतम तापमान डेटा उपलब्ध कराता है। इसमें व्यक्तिगत मॉडल आउटपुट और मल्टी-मॉडल एंसेंबल दोनों शामिल हैं, जिससे शोधकर्ता और योजनाकार विभिन्न प्रक्षेपणों की तुलना कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि किसी एक मॉडल पथ पर निर्भर रहने के बजाय अनिश्चितताओं का आकलन कर सकते हैं। उन्होंने बताया कि तकनीकी सत्यापन से पता चलता है कि "इंड्रा-सीएमआईपी6" कच्चे वैश्विक जलवायु मॉडल आउटपुट में मौजूद प्रणालीगत त्रुटियों को काफी हद तक कम करता है तथा अत्यधिक वर्षा और अत्यधिक तापमान वाले दिनों के प्रतिनिधित्व में सुधार करता है। उन्होंने बताया कि ये सुधार विशेष रूप से उन क्षेत्रों में महत्वपूर्ण हैं जहां स्थानीय भूगोल, मानसूनी गतिशीलता और स्थलाकृति जोखिम को प्रभावित करती हैं, जो भारतीय उपमहाद्वीप की प्रमुख विशेषताएं हैं। उन्होंने बताया कि यह डेटासेट विश्वविद्यालयों के शोधकर्ताओं, सरकारी विभागों, नदी बेसिन प्राधिकरणों, आपदा प्रबंधन एजेंसियों, शहरी योजनाकारों और कृषि संस्थानों सहित विभिन्न हितधारकों के लिए उपयोगी है।

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