चेन्नई , मई 21 -- भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान-मद्रास (आईआईटी-मद्रास) के एक शोध अध्ययन में खुलासा हुआ है कि कोविड महामारी के बाद तमिलनाडु की आपातकालीन स्वास्थ्य सेवा प्रणाली और अधिक मजबूत होकर उभरी है, जिससे मातृ एवं नवजात स्वास्थ्य परिणामों में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया है।

आईआईटी-मद्रास ने गुरुवार को अध्ययन रिपोर्ट जारी करते हुए कहा कि आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं (ईएमएस) और मातृ स्वास्थ्य देखभाल में निरंतर निवेश ने कोविड-19 महामारी से उत्पन्न गंभीर व्यवधानों की भरपाई करने के साथ-साथ महामारी के बाद के दौर में तमिलनाडु में मातृ और नवजात स्वास्थ्य परिणामों में महत्वपूर्ण सुधार सुनिश्चित किया है।

अध्ययन में तमिलनाडु की '108' आपातकालीन प्रतिक्रिया सेवा के वर्ष 2017 से 2024 तक के आठ वर्षों के वास्तविक एम्बुलेंस अभिलेखों का विश्लेषण किया गया। शोध में महामारी के विभिन्न चरणों और वर्ष 2023-24 के पुनरुत्थान काल के दौरान राज्य की स्वास्थ्य प्रणाली के प्रदर्शन का आकलन किया गया। आठ वर्षों के एम्बुलेंस आंकड़ों के विश्लेषण से आपात प्रतिक्रिया की दक्षता में सुधार तथा मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी का पता चला है। अध्ययन में इसे भारत और अन्य क्षेत्रों के लिए अनुकरणीय मॉडल बताया गया है।

अध्ययन के अनुसार, अधिक मातृ मृत्यु दर और कमजोर आपात स्वास्थ्य व्यवस्था वाले राज्यों के लिए तमिलनाडु मॉडल एक मार्गदर्शक ढांचा प्रस्तुत करता है। जोखिम आधारित प्रसवपूर्व देखभाल तथा '108' एम्बुलेंस नेटवर्क जैसी योजनाएं यह दर्शाती हैं कि एकीकृत और बहुस्तरीय स्वास्थ्य सेवा प्रणाली संकट की परिस्थितियों में भी मजबूती प्रदान कर सकती है। यह अध्ययन 42 जिलों और 8.4 करोड़ से अधिक आबादी से जुड़े आंकड़ों पर आधारित पूर्व के उन शोधों की तुलना में कहीं व्यापक है, जो मुख्यतः सीमित क्षेत्रों या व्यक्तिगत अस्पतालों तक केंद्रित थे। अध्ययन में कहा गया है कि एम्बुलेंस बेड़े के विस्तार, रेफरल प्रणाली को मजबूत करने तथा लक्षित मातृ स्वास्थ्य योजनाओं सहित सार्वजनिक निवेश से बड़े संकटों के दौरान भी स्वास्थ्य परिणामों में व्यापक सुधार संभव है।

यह शोध सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी प्रोफेसर पी. कंदास्वामी के नेतृत्व में किया गया, जो वर्तमान में आईआईटी-मद्रास के प्रबंधन अध्ययन तथा डेटा विज्ञान एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता विभाग में प्रैक्टिस प्रोफेसर हैं। उनके साथ मूडीज़ एनालिटिक्स प्राइवेट लिमिटेड, बेंगलुरु के अश्विन प्रकाश भी सह-शोधकर्ता रहे। अध्ययन के निष्कर्ष 'बीएमसी प्रेग्नेंसी एंड चाइल्डबर्थ' नामक प्रतिष्ठित समीक्षित मुक्त अभिगम शोध पत्रिका में प्रकाशित किये गये हैं, जो मातृ स्वास्थ्य, गर्भावस्था, प्रसव तथा नवजात देखभाल से जुड़े शोध प्रकाशित करती है। इस शोध को तमिलनाडु सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के अंतर्गत आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं तथा राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन से आंकड़ों की उपलब्धता के माध्यम से सहयोग प्राप्त हुआ।

प्रोफेसर कंदास्वामी ने कहा कि महामारी के दौरान, विशेष रूप से दूसरी लहर में, तमिलनाडु में मातृ स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच गंभीर रूप से प्रभावित हुई थी। गर्भवती महिलाओं को अस्पताल पहुंचने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, घरों में प्रसव की संख्या बढ़ी और महामारी-पूर्व अवधि की तुलना में मातृ मृत्यु दर में 98.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई। उन्होंने कहा कि शोध का उद्देश्य यह समझना था कि क्या इन व्यवधानों का दीर्घकालिक प्रतिकूल प्रभाव पड़ा या स्वास्थ्य प्रणाली ने स्थिति से उबरकर बेहतर प्रदर्शन किया। ये निष्कर्ष उत्साहजनक और सकारात्मक संकेत देते हैं।

अध्ययन के सह-लेखक अश्विन प्रकाश ने कहा कि महामारी के दौरान गर्भावस्था से संबंधित आपातकालीन कॉल में भारी वृद्धि के बावजूद प्रतिक्रिया समय, मरीज स्थानांतरण समय और अस्पताल में मरीज सौंपने की अवधि जैसे प्रमुख संकेतकों में पहली लहर के बाद उल्लेखनीय सुधार हुआ और यह दक्षता वर्ष 2023-24 तक बनी रही। शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला कि आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं की आधारभूत संरचना, स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या बढ़ाने तथा मातृ स्वास्थ्य योजनाओं में सरकार के निरंतर निवेश ने महामारी के प्रतिकूल प्रभावों को न केवल निष्प्रभावी किया, बल्कि महामारी-पूर्व स्तर से भी बेहतर परिणाम दिये।

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