पुणे , अक्टूबर 20 -- महाराष्ट्र में वरिष्ठ अधिवक्ता असीम सरोदे की दशहरा पर की गई एक सोशल मीडिया पोस्ट ने एकनाथ शिंदे गुट (शिवसेना) को राजनीतिक चर्चा और विवादों के केंद्र में ला दिया है।
श्री सरोदे ने दशहरे के मौके पर एक बड़ा दावा करते हुए कहा कि 'यह उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे का शायद आखिरी दशहरा मेला हो सकता है।' इस बयान के बाद राज्य के सियासी हलकों में हलचल तेज हो गई है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस गुट के राजनीतिक सफर में पहले पार्टी की पहचान पर कब्जा करना, फिर चुनावों में गड़बड़ियां करना और अंत में सत्ता के लिए रचे गए एक राजनीतिक नाटक का आखिरी हिस्सा शामिल है।
श्री सरोदे ने लिखा, "भले ही ऐसा लगे कि लोकतंत्र के मंच पर किए गए सभी प्रयोग सफल रहे हैं लेकिन सत्ता के इस खेल पर अभी न्यायपालिका का पर्दा गिरना बाकी है। सरकार चाहे कितनी भी ताकतवर क्यों न हो, लोकतंत्र में आखिरी फैसला सत्ता में बैठे लोगों का नहीं बल्कि संविधान और न्याय का होता है।"उनकी इन टिप्पणियों ने राजनीतिक हलकों में चर्चा छेड़ दी है और सोशल मीडिया पर उनकी पोस्ट तेजी से वायरल हो रही है। ये टिप्पणियां ऐसे समय में आई हैं जब उच्चतम न्यायालय में शिवसेना के नाम और चुनाव चिह्न के मालिकाना हक को लेकर कानूनी लड़ाई चल रही है। इस मामले ने राजनीतिक गलियारों का काफी ध्यान खींचा है क्योंकि न्यायालय का अंतिम फैसला शिंदे गुट और उद्धव ठाकरे गुट दोनों के लिए बहुत मायने रखेगा।
उम्मीद है कि इस महीने के अंत तक सुनवाई पूरी हो जाएगी, हालांकि अंतिम समय-सीमा न्यायालय की कार्यवाही पर निर्भर करेगी। ठाकरे गुट की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने उच्चतम न्यायालय में तर्क दिया है कि शिवसेना की पहचान पर उनका ही हक है।
वहीं, शिंदे गुट की ओर से पेश हुए अधिवक्ता नीरज कौल ने अपने पक्ष का पुरजोर बचाव करते हुए कहा कि महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाला गुट ही पार्टी की पहचान का असली हकदार है। दोनों पक्षों के अधिवक्ताओं ने अपने-अपने तर्कों के समर्थन में कई अदालती नज़ीरों का हवाला दिया है। अब देशभर के राजनीतिक दलों और पर्यवेक्षकों को उच्चतम न्यायालय के फैसले का बेसब्री से इंतज़ार है।
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