नयी दिल्ली , अगस्त 07 -- असम एक बार फिर विनाशकारी बाढ़ से जूझ रहा है, जिससे लाखों लोग प्रभावित हुए हैं और 90 से अधिक लोगों की जान चली गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस संकट के पीछे मुख्य रूप से तीन कारण हैं - जलवायु परिवर्तन, हिमालयी क्षेत्रों का गर्म होना और एक ऐसी नदी प्रणाली, जिसमें बहुत तेजी से बदलाव हो रहा है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि अब बाढ़ केवल भारी मानसूनी बारिश का परिणाम नहीं रह गई है। बदलती नदी की धारा, तेज़ी से बढ़ता कटाव और बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में बढ़ती आबादी व बस्तियां भी इसके प्रमुख कारण हैं। इन्हीं वजहों से बाढ़ पहले की तुलना में अधिक अप्रत्याशित और विनाशकारी होती जा रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार, असम में अब बाढ़ कई कारणों के एक साथ असर से आती है, जिससे तबाही का खतरा और बढ़ जाता है।
मौसम विशेषज्ञों के मुताबिक, राज्य की लगभग 40 प्रतिशत भूमि बाढ़ के खतरे वाली है। गाद से भरी ब्रह्मपुत्र नदी लगातार अपना रास्ता बदलती है, किनारों को काटती है और बाढ़ के मैदानों का रूप बदलती है। इसके अलावा, भारी बारिश और बादल फटने जैसी घटनाएं भी बढ़ रही हैं।
भारत में प्रवेश के बाद ब्रह्मपुत्र नदी असम घाटी में करीब 710 किलोमीटर बहती है। यहां नदी के कई रास्ते, बदलते रेत के टीले और बड़े जलोढ़ मैदान हैं, जिसके कारण बाढ़ और कटाव की समस्या बार-बार पैदा होती है। वनों की कटाई, बढ़ता शहरीकरण और जमीन के गलत इस्तेमाल से इलाके की पानी सोखने की क्षमता भी कम हो गई है।
जलवायु परिवर्तन के कारण इन खतरों के और अधिक गंभीर होने की आशंका है। अध्ययनों से पता चलता है कि मजबूत मानसूनी बारिश और हिमालयी ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने के कारण 2020 से 2059 के बीच ब्रह्मपुत्र घाटी में और अधिक बार और भीषण बाढ़ आ सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर वैश्विक तापमान में वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित भी कर लिया जाए, तब भी 2100 तक हिमालय के कम से कम एक-तिहाई ग्लेशियर गायब हो चुके होंगे, और यदि प्रदूषण का स्तर अधिक रहा तो नुकसान इससे भी बहुत ज्यादा होगा।
असम राज्य जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (2021-2030) के अनुसार, भविष्य की जलवायु परिस्थितियों में अत्यधिक बारिश की घटनाओं में 5 से 38 प्रतिशत की वृद्धि और बाढ़ की घटनाओं में 25 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि होने का अनुमान है। इसमें यह भी अनुमान लगाया गया है कि सदी के अंत तक ब्रह्मपुत्र के जल प्रवाह में 13 से 15 प्रतिशत की वृद्धि और तलछट के भार में लगभग 40 प्रतिशत की वृद्धि होगी, जिससे कटाव और बाढ़ का खतरा और बढ़ जाएगा।
इसके बुरे प्रभाव अभी से दिखाई देने लगे हैं। वर्ष 2019 में बाढ़ ने 160,000 हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि को डुबो दिया था और लाखों लोगों को विस्थापित कर दिया था। वर्ष 2024 में भारत में आपदाओं के कारण कुल 54 लाख लोग विस्थापित हुए थे, जिनमें अकेले 25 लाख लोग असम से थे। वर्ष 1950 के बाद से राज्य ने नदी के कटाव के कारण अपनी लगभग 4.27 लाख हेक्टेयर यानी कुल भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 7.4 प्रतिशत हिस्सा खो दिया है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि भविष्य में बाढ़ के खतरे को कम करने के लिए पूरी नदी घाटी की बेहतर योजना, राज्यों के बीच सहयोग, जलवायु के अनुकूल ढांचा, सटीक मौसम पूर्वानुमान और प्रभावी उपायों की जरूरत है। इसके लिए ब्रह्मपुत्र को अलग-अलग बाढ़ की घटनाओं के बजाय एक जुड़ी हुई पूरी नदी प्रणाली के रूप में समझना होगा।
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