अलवर , जनवरी 25 -- राजस्थान में अलवर के प्रसिद्ध भपंग वादक गफरुद्दीन मेवाती जोगी को पद्मश्री पुरस्कार के लिये चुना गया है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार गफरुदीन मेवाती जोगी 60 से ज्यादा देशों में अपनी प्रस्तुति दे चुके हैं। भगवान शिव के डमरू से तैयार किए गए वाद्य यंत्र भपंग बजाना उनकी पुश्तैनी परम्परा है। इनका बेटा शाहरुख मेवाती जोगी आठवीं पीढ़ी है जो भपंग वादक रहा है।

अलवर के मुंगस्का के टाइगर कॉलोनी में रहने वाले 68 साल के गफरुदीन को सुबह फोन पर यह पद्मश्री अवार्ड मिलने की जानकारी मिली। पद्मश्री की जानकारी मिलते ही परिवार में खुशी एवं जश्न का माहौल है।

गफरुदीन ने अपने पिता स्वर्गीय बुध सिंह जोगी के साथ तीन वर्ष की उम्र में भपंग बजाना शुरू किया था। गफरुदीन के बेटे शहरुख खान मेवाती जोगी एवं उनके छोटे बच्चे भी भपंग बजाते हैं।

महाभारत को मेवात एरिया में पांडव कड़े के रूप में गाया एवं बजाया जाता है। कहा जाता है कि पांडव अज्ञातवास के दौरान जब अलवर के विराटनगर क्षेत्र में पहुंचे थे। तो उस पूरे प्रसंग को भी महाभारत में शामिल किया गया है। उसे भी पांडव कड़े के रूप में गाया जाता है। साथ ही बृज एवं मेवाती शैली के लोक दोहे और लोक गीत देश विदेश के मंच पर प्रस्तुत किए हैं।

गफरुदीन को राजस्थान सरकार, संगीत नाटक अकादमी नई दिल्ली से पुरस्कार मिल चुका है। इसके अलावा इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, पेरिस और दुबई सहित 60 से ज्यादा देशों में यह लोग अपने भपंग वादन की प्रस्तुति पेश कर चुके हैं। साथ ही इंग्लैंड में एलिजाबेथ सहित कई ऐसे बड़े कार्यक्रमों में अपनी प्रस्तुति पेश कर चुके है। कोरोना हो या स्वच्छता सभी पर इन्होंने अपने भपंग के माध्यम से लोगों को लोकगीत गाकर संदेश दिया। इनके लोकगीत एवं भपंग वादन के लोग दीवाने हैं व दूर-दूर से इनको सुनने के लिए लोग आते हैं।

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