नागपुर , अक्टूबर 31 -- बॉम्बे उच्च न्यायालय की नागपुर पीठ ने नक्सली समूह से कथित संबंधों के आरोपों में सामाजिक कार्यकर्ता अरुण थॉमस फेरेरा की सितंबर 2011 में हुई गिरफ्तारी को अवैध घोषित करार दिया है और महाराष्ट्र सरकार को उन्हें दो लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया है।
उच्च न्यायालय ने नक्सली संगठन से कथित संबंधों के संदेह में कार्यकर्ता अरुण फेरेरा की गिरफ्तारी में पुलिस की ओर से हुई गंभीर लापरवाही बताया । न्यायालय ने पुलिस कार्रवाई में गंभीर अनियमितताएँ पाईं, जिनमें गिरफ्तारी के कारणों का खुलासा न करना, उनके रिश्तेदारों को सूचित न करना और आवश्यक गिरफ्तारी दस्तावेज तैयार न करना शामिल है। पुलिस फेरेरा को गिरफ्तार करते समय उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन करने में विफल रही।
नागपुर पीठ की न्यायमूर्ति उर्मिला जोशी-फाल्के और न्यायमूर्ति राज वाकोड़े की खंडपीठ ने 27 अक्टूबर के अपने फैसले में पुलिस कार्रवाई को फेरेरा के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करार देते हुए पुलिस की कड़ी आलोचना की और महाराष्ट्र सरकार को उन्हें 2 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया।
अपनी याचिका में श्री फेरेरा ने तर्क दिया था कि उन्हें उनकी गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी नहीं दी गई थी। उच्च न्यायालय ने माना कि पुलिस ने संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 के तहत गारंटीकृत उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन किया है, जो जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करते हैं तथा मनमानी गिरफ्तारी व हिरासत के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करते हैं।
यह देखते हुए कि कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्राथमिक रूप से जिम्मेदार पुलिस खुद कानून का उल्लंघन नहीं कर सकती, पीठ ने कहा कि ऐसे उल्लंघनों के लिए सजा आनुपातिक रूप से सख्त होनी चाहिए ताकि इसका निवारक प्रभाव पड़े और जनता का विश्वास बहाल हो सके।
न्यायालय ने महाराष्ट्र पुलिस के आदर्श वाक्य 'सद्रक्षणाय खलनिग्रहणाय' (सज्जनों की रक्षा और दुष्टों का दमन) का भी हवाला दिया और कहा कि इसका सम्मान किया जाना चाहिए। पीठ ने टिप्पणी की कि कानून प्रवर्तन एजेंसियों को यह याद रखना चाहिए कि उनका कर्तव्य किसी एक आरोपी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका विस्तार राज्य और समग्र समाज तक है।
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