हैदराबाद , जनवरी 20 -- तेलंगाना में जनगांव मंडल के येरुगोल्लापाडु गांव की पालमकुला अरुणा पारंपरिक रूप से पुरुषों के दबदबे को चुनौती देते हुए सफलतापूर्वक जेसीबी मशीन चलाकर ग्रामीण महिला सशक्तीकरण का प्रतीक बनकर उभरी हैं।

महज दसवीं कक्षा तक पढ़ाई करने वाली अरुणा जब छोटी थी, तभी उसके पिता की मृत्यु हो गयी थी। इसके बाद अरुणा और परिवार को बेहद मुश्किल हालात से गुजरना पड़ा। 2012 में शादी के बाद अरुणा और उनके पति नागराजू को परिवार से बहुत कम मदद मिली और वे कर्ज के बोझ तले दब गये।

परिवार के गुजारे के लिए नागराजू जेसीबी चालक का काम करते थे और अरुणा खेत में मजदूरी और सिलाई करती थीं। इसके बाद 2013 में अरुणा की जिंदगी में अहम बदलाव तब आया, जब वह 'स्वयं सहायता समूह' (एसएचजी) में शामिल हुईं। वर्ष 2014 में मिले एक लाख रुपये के ऋण से परिवार ने पुराने कर्जे चुकायें। इसके बाद से उनके आर्थिक हालात सुधरने लगे।

2019 में एसएचजी बैंक लिंकेज, ग्राम संगठन और स्त्री निधि के सहयोग से उन्होंने गांव की पहली जेसीबी खरीदी। नियमित काम और वित्तीय अनुशासन से उन्होंने अपने सभी कर्ज पूरी तरह चुका दिये।

पति के प्रोत्साहन से अरुणा ने खुद मशीन चलानी सीखी और 2024 में जेसीबी ड्राइविंग प्रशिक्षण पूरा किया। आज परिवार जेसीबी से लगभग 1,000 से 1,200 रुपये प्रति घंटे कमा रहा है, जिससे औसतन प्रतिदिन का उनका मेहनताना करीब 4,000-5,000 रुपये बन जाता है। एसएचजी की मदद से परिवार ने कुल 22.10 लाख रुपये का कर्ज लिया है और उन्होंने खेती, किराने की दुकान, परिवहन सेवा और एक छोटी बैग बनाने की यूनिट शुरू की है।

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