नयी दिल्ली , दिसंबर 22 -- पर्यावरण कार्यकर्ता हितेंद्र गांधी ने अरावली पर्वतमाला के भीतर संरक्षित क्षेत्रों की पहचान करने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले '100 मीटर परीक्षण' की समीक्षा करने की मांग को लेकर सोमवार को सोमवार को उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया ।
श्री गांधी ने मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत को संबोधित एक विस्तृत प्रतिवेदन में शीर्ष अदालत से इस कठोर मानक पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि यह नियम अरावली के उन पारिस्थितिक रूप से महत्वपूर्ण हिस्सों को बाहर कर देता है जो इस मानदंड को पूरा नहीं करते हैं, लेकिन पर्यावरणीय रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण बने हुए हैं। उन्होंने तर्क दिया कि यह मानदंड पारिस्थितिक रूप से त्रुटिपूर्ण और कानूनी रूप से मनमाना है।
दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत प्रणालियों में से एक अरावली पर्वतमाला गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक फैली हुई है। यह मरुस्थलीकरण को रोकने, जलवायु को विनियमित करने और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में भूजल पुनर्भरण की सुविधा प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। खनन, निर्माण और 'रियल एस्टेट' विकास के कारण पिछले तीन दशकों से इस क्षेत्र को निरंतर दबाव का सामना करना पड़ा है।
वर्तमान याचिका के केंद्र में '100 मीटर का नियम' है, जो केवल उन्हीं पहाड़ियों को संरक्षित अरावली पहाड़ियों के रूप में मानता है, जो आसपास के मैदानी इलाकों से 100 मीटर से अधिक ऊंची हैं।
श्री गांधी ने तर्क दिया है कि इस तरह का दृष्टिकोण 'भूगर्भीय निरंतरता' और 'पारिस्थितिक कार्य' की उपेक्षा करता है, क्योंकि निचली चोटियां, छोटी पहाड़ियां और उबड़-खाबड़ इलाके, जिन्हें अक्सर इस नियम के तहत बाहर रखा जाता है, भूजल पुनर्भरण, सतही जल प्रवाह के प्रबंधन और जैव विविधता संरक्षण के लिए अभिन्न अंग हैं।
प्रतिवेदन में कहा गया है कि पर्यावरण विशेषज्ञों का लंबे समय से यह मानना रहा है कि अरावली केवल प्रमुख चोटियों तक सीमित नहीं है, विशेष रूप से हरियाणा और राजस्थान के कुछ हिस्सों में, जहां पर्वतमाला का अधिकांश हिस्सा निचली चोटियों और चट्टानी पहाड़ों के रूप में मौजूद है।
याचिकाकर्ता के अनुसार, संरक्षण को केवल स्पष्ट रूप से दिखने वाली ऊंची पहाड़ियों तक सीमित करने से नाजुक लेकिन कानूनी रूप से असुरक्षित क्षेत्रों में खनन और निर्माण गतिविधियों को बढ़ावा मिलता है।
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