नयी दिल्ली , सितंबर 07 -- उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को अरावली पहाड़ियों की परिभाषा और सीमांकन पर रिपोर्ट दाखिल करने के लिए उच्चाधिकार प्राप्त समिति (एचपीसी) को 30 नवंबर तक का समय दिया।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने समिति की फरवरी 2027 तक का समय देने की मांग को अस्वीकार करते हुए कहा कि आवश्यकता पड़ने पर समिति इस कार्य को पूरा करने के लिए "दिन-रात काम" करे।
पीठ ने स्पष्ट किया कि अब और समय नहीं दिया जाएगा। मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि समिति ने फरवरी 2027 तक का समय उनके सेवानिवृत्त होने को ध्यान में रखते हुए मांगा है। उन्होंने कहा, "समिति ने मूल रूप से मेरी सेवानिवृत्ति तक मामले को टालने का अनुरोध किया है।" मुख्य न्यायाधीश 9 फरवरी को सेवानिवृत्त होने वाले हैं।
समिति ने इस कवायद को पूरा करने के लिए छह महीने का अतिरिक्त समय मांगा था। समिति ने कहा था कि राजस्थान और गुजरात के आदिवासी समुदायों समेत सभी संबंधित पक्षों को सुनने की आवश्यकता है। पीठ ने कहा कि समिति को अंतिम रिपोर्ट दाखिल करनी होगी। हालांकि, जरूरी मामलों पर अदालत को अलग से विचार करने में सक्षम बनाने के लिए वह मुद्देवार अंतरिम रिपोर्ट दाखिल कर सकती है।
केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने पीठ को बताया कि अंतरिम रिपोर्ट पहले ही तैयार की जा चुकी है, लेकिन प्रभावित पक्षों को प्रभावी ढंग से सुनने के लिए और समय की आवश्यकता है। मामले की अगली सुनवाई दो दिसंबर को होगी।
शीर्ष अदालत अरावली की परिभाषा और सीमांकन से संबंधित स्वत: संज्ञान कार्यवाही पर सुनवाई कर रही थी। यह कार्यवाही नवंबर 2025 में दिये गये उस फैसले के बाद शुरू हुई थी, जिसमें खनन गतिविधियों के नियमन के लिए अरावली पहाड़ियों की ऊंचाई आधारित परिभाषा को स्वीकार किया गया था। पर्यावरण संबंधी प्रभावों और संरक्षण के दायरे में आने वाले क्षेत्र को लेकर उठी चिंताओं के बीच बाद में इस फैसले को स्थगित रखा गया था।
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