तेहरान , जून 18 -- अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौता ज्ञापन (एमओयू) से प्रतिबंधों में राहत, जब्त की हुई विदेशी परिसंपत्तियों तक पहुंच और तेल निर्यात बढ़ने की उम्मीदें जगी हैं, लेकिन ईरानी अर्थशास्त्रियों का मानना है कि केवल कूटनीतिक सफलता से देश की गहरी आर्थिक समस्याएं दूर नहीं होंगी।
समझौते में 60 दिन की वार्ता अवधि, होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने की दिशा में कदम, ईरानी तेल निर्यात पर अमेरिकी छूट और प्रतिबंधों और जब्त की हुई परिसंपत्ति को लेकर चर्चा का प्रावधान है। इससे ईरानी मुद्रा के मजबूत होने, महंगाई कम होने और लोगों की जीवन स्थितियों में सुधार की उम्मीद बढ़ी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इन उम्मीदों को लेकर अधिक उत्साहित होने की जरूरत नहीं है। ईरान के पूर्व केंद्रीय बैंक उप-गवर्नर हैदर मोस्तख्देमीन-हुसैनी ने कहा कि समझौता आर्थिक सुधार के लिए जरूरी शर्त है, लेकिन अपने आप में पर्याप्त नहीं है।
उन्होंने कहा, "आर्थिक सुधार के लिए समझौता आवश्यक है, लेकिन केवल इससे समस्या का समाधान नहीं होगा।"विशेषज्ञों का कहना है कि समझौते में प्रस्तावित अधिकांश आर्थिक लाभ कई शर्तों से जुड़े हुए हैं। अमेरिकी अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि प्रतिबंधों में स्वत: राहत, जब्त की हुई धनराशि की तत्काल रिहाई या ईरान को प्रत्यक्ष अमेरिकी वित्तीय सहायता नहीं दी जाएगी। आर्थिक लाभ इस बात पर निर्भर करेंगे कि ईरान अपने दायित्वों का कितना पालन करता है और भविष्य की वार्ताओं में कितनी प्रगति होती है।
प्रस्तावित 300 अरब डॉलर के पुनर्निर्माण एवं विकास कार्यक्रम को समझौते का सबसे चर्चित हिस्सा माना जा रहा है। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार इसमें प्रत्यक्ष अमेरिकी वित्तपोषण शामिल नहीं है, बल्कि प्रतिबंधों में ढील और व्यापक समझौते की स्थिति में तीसरे देशों और निजी कंपनियों के निवेश का रास्ता खुल सकता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उपराष्ट्रपति जेडी वेंस पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि अमेरिकी प्रशासन ईरान को किसी प्रकार की प्रत्यक्ष वित्तीय सहायता या मुआवजा नहीं देगा। जब्त की हुई ईरानी निधि को लेकर भी स्थिति स्पष्ट नहीं है। ईरानी अधिकारियों ने इसे अपनी निधि वापस पाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है, जबकि अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि कोई भी परिसंपत्ति स्वत: जारी नहीं की जाएगी और यह पूरी तरह ईरान के अनुपालन पर निर्भर करेगा।
ईरान के केंद्रीय बैंक के गवर्नर अब्दोलनासेर हेम्मती ने कहा कि समझौते में परिसंपत्तियों की रिहाई को लेकर अमेरिकी दायित्वों का उल्लेख है, लेकिन इसकी वास्तविक उपयोगिता क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि ईरान की चुनौतियां केवल प्रतिबंधों तक सीमित नहीं हैं। विश्लेषक नासेर जाकेरी के अनुसार किसी भी कूटनीतिक अवसर की सफलता घरेलू आर्थिक नीतियों और सरकार की नयी संभावनाओं का लाभ उठाने की क्षमता पर निर्भर करेगी।
अर्थशास्त्र के प्रोफेसर अली गनबरी ने भी अत्यधिक आशावाद के प्रति आगाह करते हुए कहा, "यह मान लेना सही नहीं होगा कि केवल एक प्रारंभिक समझौते से ईरान की सभी आर्थिक समस्याएं हल हो जाएंगी। स्थायी आर्थिक विकास के लिए संरचनात्मक सुधार जरूरी हैं।"ईरान इस समय गंभीर महंगाई से जूझ रहा है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार वार्षिक मुद्रास्फीति 80 प्रतिशत से अधिक है। वर्ष 2015 के परमाणु समझौते के बाद महंगाई कुछ समय के लिए घटी थी, लेकिन 2018 में ट्रंप प्रशासन द्वारा समझौते से हटने और प्रतिबंध फिर से लागू करने के बाद यह दोबारा बढ़ गयी।
विशेषज्ञों का मानना है कि नया समझौता तेल निर्यात बढ़ाने, विदेशी राजस्व तक पहुंच आसान बनाने और व्यापारिक प्रतिबंधों में कुछ राहत दिलाने में मदद कर सकता है। एमओयू के तहत वार्ता अवधि के दौरान अमेरिका ईरानी कच्चे तेल के निर्यात तथा उससे जुड़ी वित्तीय और परिवहन सेवाओं के लिए छूट प्रदान करेगा।
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