अमरोहा , मई 8 -- उत्तर प्रदेश में अमरोहा जिले के मंडी धनौरा क्षेत्र स्थित बाढ़ खंड नाला अब सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार वर्षों से जमा सीवेज और गंदे पानी के कारण यह क्षेत्र एंटीबायोटिक प्रतिरोधी जीवाणुओं यानी 'सुपरबग' का संभावित हॉटस्पॉट बन सकता है। एक ओर स्वास्थ्य विभाग संचारी रोगों की रोकथाम के लिए अभियान चला रहा है, वहीं दूसरी ओर मंडी धनौरा का यह नाला स्थानीय लोगों के लिए नई चिंता का कारण बना हुआ है। हाल ही में केंद्र सरकार की नेशनल वेक्टर बॉर्न डिजीज कंट्रोल प्रोग्राम (एनवीबीडीसीपी) टीम ने जनपद के पपसरा, राजबपुर और गजरौला जैसे उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों का दौरा कर सर्वे कार्यों की समीक्षा की थी।
विशेषज्ञों का कहना है कि लंबे समय से बिना सफाई के जमा सीवेज में ऐसे जीन विकसित हो सकते हैं, जो बैक्टीरिया को एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति अत्यधिक प्रतिरोधी बना देते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार रोगाणुरोधी प्रतिरोध (एएमआर) तब उत्पन्न होता है जब सूक्ष्मजीव लगातार दवाओं के संपर्क में रहकर उनके अनुकूल खुद को ढाल लेते हैं, जिससे सामान्य संक्रमणों पर भी दवाएं असर करना बंद कर देती हैं।
सीवेज पर किए गए अध्ययनों में 'शॉटगन मेटाजीनोमिक्स' तकनीक के माध्यम से यह पाया गया है कि शहरी गंदे पानी में टेट्रासाइक्लिन और बीटा-लैक्टम जैसी सामान्य एंटीबायोटिक दवाओं के खिलाफ प्रतिरोध तेजी से बढ़ रहा है।
जानकारों के मुताबिक मंडी धनौरा के बाढ़ खंड नाले में मौजूद प्रतिरोधी जीन 'मोबाइल जेनेटिक एलिमेंट्स' के जरिए अन्य बैक्टीरिया में भी फैल सकते हैं, जिससे ऐसे सूक्ष्मजीव विकसित होने की आशंका है जिनका इलाज आधुनिक चिकित्सा पद्धति से कठिन हो जाएगा।
हालांकि केंद्रीय टीम के निरीक्षण में कई स्थानों पर मच्छरों के लार्वा जैसी गंभीर विसंगतियां नहीं मिलीं, लेकिन विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि सीवेज के भीतर पनप रहा यह अदृश्य खतरा भविष्य में गंभीर संक्रमणों का कारण बन सकता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि वेस्टवॉटर निगरानी प्रणाली को 'अर्ली वॉर्निंग सिस्टम' के रूप में विकसित कर समय रहते ऐसे प्रतिरोधी जीनों की पहचान और नियंत्रण जरूरी है, ताकि एंटीबायोटिक दवाओं की प्रभावशीलता को सुरक्षित रखा जा सके।
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