अमरोहा , अगस्त 07 -- बेडशीट, कालीन और टेबल कवर जैसे हस्तनिर्मित कपड़ा उत्पादों के लिए देशभर में पहचान रखने वाला उत्तर प्रदेश का अमरोहा हथकरघा उद्योग आज गंभीर संकट से गुजर रहा है। कभी जिले की करीब 17 प्रतिशत आबादी को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार देने वाला यह पारंपरिक कुटीर उद्योग कच्चे माल की बढ़ती कीमत, विपणन व्यवस्था के अभाव और सरकारी सुविधाओं की कमी के चलते लगातार सिमटता जा रहा है।
करीब दो दशक पहले अमरोहा और नौगावां सादात क्षेत्र में एक हजार से अधिक हथकरघा इकाइयां संचालित होती थीं, लेकिन अब इनकी संख्या घटकर करीब 200 रह गई है। लगभग 800 छोटी-बड़ी इकाइयों के बंद होने से हजारों बुनकर परिवारों की आजीविका प्रभावित हुई है और इससे जुड़े कालीन कारोबार को भी भारी नुकसान पहुंचा है।
मंडी धनौरा का ऐतिहासिक सघन क्षेत्र कभी हथकरघा एवं खादी ग्रामोद्योग के मॉडल के रूप में जाना जाता था। यहां पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई सहित देश-विदेश के प्रतिनिधिमंडल खादी ग्रामोद्योग मॉडल को देखने पहुंचते थे। समय के साथ सरकारी संरक्षण और विपणन व्यवस्था कमजोर होने से यह क्षेत्र भी अपने पुराने गौरव को खोता चला गया।
नेशनल बुनकर हथकरघा औद्योगिक उत्पादन सहकारी समिति के अनुसार, पहले उत्तर प्रदेश हथकरघा निगम के पर्चेज डिपो के माध्यम से प्रत्येक बुनकर से प्रतिमाह 12 बेडशीट खरीदी जाती थीं। इसके अलावा स्थानीय सूत मिल से सात प्रतिशत सब्सिडी पर धागा उपलब्ध कराया जाता था। इस व्यवस्था से करीब पांच हजार लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार मिलता था।
पर्चेज डिपो और स्थानीय सूत मिल के बंद होने के बाद बुनकरों के सामने कच्चे माल का संकट खड़ा हो गया। अब उन्हें महंगा धागा और अन्य कच्चा माल हरियाणा के पानीपत से मंगाना पड़ रहा है। परिवहन खर्च और उत्पादन लागत बढ़ने से तैयार उत्पादों पर मुनाफा लगातार कम हुआ है। इसका असर यह हुआ कि बड़ी संख्या में कुशल कारीगर अपने पुश्तैनी व्यवसाय को छोड़कर दूसरे कामों की ओर जाने लगे हैं।
स्थानीय कारोबारियों और बुनकर संगठनों ने पानीपत पर निर्भरता खत्म करने के लिए लंबे समय से बंद पड़ी सहकारी कताई मिल को दोबारा शुरू कराने की मांग की है। उनका कहना है कि स्थानीय स्तर पर धागा उपलब्ध होने से उत्पादन लागत घटेगी और बुनकरों को रोजगार के बेहतर अवसर मिल सकेंगे।
हथकरघा क्षेत्र के इस संकट के बीच प्रदेश सरकार की 'संत कबीर टेक्सटाइल एवं अपैरल पार्क योजना' से अमरोहा के उद्योग को पुनर्जीवन मिलने की उम्मीद जगी है। बताया गया है कि अमरोहा में करीब 80 एकड़ भूमि चिन्हित कर विभागीय सर्वे पूरा कर लिया गया है। पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल पर प्रस्तावित पार्क के लिए उद्यमियों से निवेश प्रस्ताव मांगे जा रहे हैं।
मुरादाबाद मंडल में हथकरघा विकास से जुड़े सूत्रों के मुताबिक पिछले दो वर्षों से बंद पावरलूम सुविधा को बहाल करने के लिए शासन स्तर पर पत्राचार जारी है। साथ ही बुनकरों के लिए संचालित मौजूदा कल्याणकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है।
जानकारों का कहना है कि देश में 35 लाख से अधिक बुनकर हैं, जिनमें करीब 72 प्रतिशत महिलाएं हैं। ऐसे में हथकरघा उद्योग केवल पारंपरिक रोजगार का साधन ही नहीं बल्कि बड़ी संख्या में महिलाओं की आजीविका और आत्मनिर्भरता का आधार भी है।
यदि अमरोहा के बुनकरों को स्थानीय स्तर पर सस्ता और सुलभ कच्चा माल, आधुनिक तकनीक, बेहतर विपणन व्यवस्था और स्थायी सरकारी खरीद उपलब्ध हो सके तो इस पारंपरिक उद्योग को फिर से खड़ा किया जा सकता है। टेक्सटाइल पार्क, बंद कताई मिल और पावरलूम सुविधा के पुनरुद्धार की योजनाएं यदि जमीन पर उतरती हैं तो अमरोहा के हथकरघा उद्योग के पुराने गौरव और रोजगार के अवसरों की वापसी की उम्मीद मजबूत हो सकती है।
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