नयी दिल्ली , अप्रैल 16 -- उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को बॉम्बे उच्च न्यायालय के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें अनिल अंबानी के खिलाफ बैंक ऋण धोखाधड़ी वर्गीकरण की कार्यवाही को आगे बढ़ाने की अनुमति दी गयी थी।

यह कार्यवाही बैंकों के एक कंसोर्टियम द्वारा शुरू की गयी थी। उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने 23 फरवरी को एकल न्यायाधीश के उस आदेश को निरस्त कर दिया था, जिसमें दिसंबर 2025 में इस प्रक्रिया पर रोक लगा दी गयी थी।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय के फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं है।

शीर्ष अदालत ने श्री अंबानी के उस बयान को रिकॉर्ड पर लिया जिसमें उन्होंने बैंक ऑफ बड़ौदा, इंडियन ओवरसीज बैंक और आईडीबीआई बैंक के साथ मामले के निपटारे की इच्छा जतायी थी। उच्चतम न्यायालय ने मामले की सुनवाई को तेज करने का भी निर्देश दिया और कहा कि आरोपी कानून के तहत उपलब्ध उपायों का उपयोग कर सकते हैं।

कर्जदाता बैंकों की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने श्री अंबानी के समझौते संबंधी बयान को रिकॉर्ड में लेने का विरोध किया। उन्होंने कहा कि इसका असर अन्य लंबित जांचों और कार्यवाहियों पर पड़ सकता है।

श्री अंबानी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, श्याम दीवान और नरेंद्र हुड्डा ने पैरवी की। श्री सिब्बल ने तर्क दिया कि एकल न्यायाधीश द्वारा दी गयी अंतरिम राहत को खंडपीठ द्वारा पलटना उचित नहीं था। उन्होंने कहा कि ऋण को धोखाधड़ी घोषित करना "सिविल डेथ" के समान है, क्योंकि इसके बाद कोई वित्तीय संस्था श्री अंबानी को ऋण नहीं देगी।

उन्होंने बीडीओ एलएलपी की ऑडिट रिपोर्ट पर भी सवाल उठाया और कहा कि यह भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के 2024 के निर्देशों के तहत योग्य ऑडिट इकाई नहीं है। इस पर श्री मेहता ने कहा कि यह रिपोर्ट एक प्रतिष्ठित वैश्विक ऑडिटर द्वारा तैयार की गयी है और कंसोर्टियम द्वारा टेंडर प्रक्रिया के जरिए चयनित किया गया था।

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