मुंबई , सितंबर 07 -- मुंबई बंदरगाह प्राधिकरण (एमबीपीए) की जमीन पर काम कर रहे 200 से अधिक व्यापारियों, किरायेदारों और परिवारों ने आखिरकार उस समय राहत की सांस ली, जब उन्हें भारी आर्थिक नुकसान से बचाने वाली एक अहम कानूनी जीत मिली।
बॉम्बे हाई कोर्ट ने अपने एक ऐतिहासिक फैसले में न्यायमूर्ति भारती डांगरे और मंजूषा देशपांडे की पीठ ने एमबीपीए के विवादित फैसले को रद्द कर दिया, जिसके तहत अक्टूबर 2012 से सितंबर 2022 तक का बहुत अधिक किराया बकाया किरायेदारों पर थोपा गया था। अदालत ने उन सरकारी अधिसूचनाओं और वसूली नोटिस को भी अमान्य कर दिया।
अदालत ने फैसला सुनाया कि ऐतिहासिक 'जमशेद होर्मुसजी वाडिया' मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा समर्थित समझौता प्रस्ताव ही इन संपत्तियों पर कानूनी रूप से लागू होता है, जिसके तहत 31 मार्च 2024 तक सालाना 4 प्रतिशत की बढ़ोतरी होगी। पीठ ने बंदरगाह प्राधिकरण को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि सरकारी संस्थाएं प्राइवेट मकान मालिकों की तरह काम नहीं कर सकतीं और न ही जमीन की काल्पनिक, सबसे अधिक बाजार कीमत के आधार पर अंदरूनी तौर पर दरें बदलकर मुनाफाखोरी और मनमाना किराया वसूलने का काम कर सकती हैं।
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